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नई दिल्ली: रिश्वत की शिकायत मिली, CBI ने तुरंत FIR दर्ज की और कुछ ही घंटों में जाल बिछा दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने इस तेजी पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे पैदा होने वाले शक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे संदेह की जांच जरूरी थी। सुप्रीम कोर्ट ने करीब दो दशक पुराने रिश्वत मामले में आरोपी सरकारी अधिकारी को बरी कर दिया।

बिचौलिए से बरामद हुई रिश्वत, अधिकारी नहीं पकड़ा गया

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एन.के. सिंह की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए जांच में कई खामियां पाईं। अदालत ने गौर किया कि आरोपी अधिकारी रिश्वत की रकम के साथ पकड़ा नहीं गया था। रकम एक बिचौलिए से बरामद हुई थी। अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि बिचौलिए ने जो रकम ली थी, वह आरोपी अधिकारी के लिए थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर अधिकारी को आपराधिक जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया।

2005 में हुई थी रिश्वत की शिकायत

मामला वर्ष 2005 का है। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि रेलवे सुरक्षा बल (RPF) में डिविजनल सिक्योरिटी कमिश्नर के पद पर तैनात अधिकारी अपने अधीन काम करने वाले अधिकारियों से ट्रांसफर और पोस्टिंग के बदले कथित तौर पर अवैध रकम की मांग कर रहा था।शिकायत मिलने के बाद CBI ने 4 अगस्त 2005 को दोपहर करीब 2 बजे FIR दर्ज की। इसके कुछ ही घंटों के भीतर एजेंसी ने जाल बिछाने की कार्रवाई शुरू कर दी।

ढाई घंटे में पूरा किया गया ट्रैप

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, FIR दोपहर 2 बजे दर्ज हुई और उसी दिन ट्रैप की योजना बनाई गई। दोपहर 2 बजे से शाम करीब 4:30 बजे के बीच पूरा जाल बिछाया गया। अदालत ने कहा कि इतनी तेजी से ट्रैप करने के लिए जांच एजेंसी को सीधे तौर पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इस तरह की तेजी कुछ संदेह जरूर पैदा कर सकती है। इन संदेहों को जांच के दौरान नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए था। पीठ ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता की ओर से उठाए गए इन संदेहों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया।

बिचौलिए को बनाया गया था गवाह

इस मामले में रिश्वत की रकम लेने वाले बिचौलिए को बाद में माफी दे दी गई। उसने दावा किया था कि उसने अधिकारी की ओर से रिश्वत की रकम ली थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल बिचौलिए के इस दावे के आधार पर सरकारी कर्मचारी को आपराधिक रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अभियोजन को इस दावे की पुष्टि करने वाला भरोसेमंद साक्ष्य पेश करना जरूरी था।

केवल पैसे के लेन-देन से अपराध साबित नहीं होता

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट’ के तहत केवल रिश्वत की रकम के लेन-देन से किसी सरकारी कर्मचारी की आपराधिक जिम्मेदारी अपने आप तय नहीं हो जाती। अभियोजन पक्ष को विश्वसनीय सबूतों के जरिए यह साबित करना होगा कि बिचौलिया आरोपी के अधिकार, निर्देश या लाभ के लिए काम कर रहा था। इसके साथ यह भी साबित करना जरूरी है कि रिश्वत की मांग स्वयं आरोपी ने की थी।

तीसरे व्यक्ति से रकम मिलने पर अधिकारी दोषी नहीं माना जा सकता

अदालत ने कहा कि किसी तीसरे व्यक्ति द्वारा रिश्वत की रकम स्वीकार किए जाने भर से सरकारी कर्मचारी पर आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। इस मामले में CBI यह स्थापित करने में विफल रही कि बिचौलिया आरोपी अधिकारी की ओर से रकम ले रहा था और यह रकम वास्तव में अधिकारी के लिए थी। अधिकारी स्वयं रिश्वत की रकम के साथ पकड़ा भी नहीं गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारी को किया बरी

मामले के साक्ष्यों और जांच में सामने आई खामियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी अधिकारी को बरी कर दिया। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि भ्रष्टाचार के मामले में सरकारी कर्मचारी की आपराधिक जिम्मेदारी तय करने के लिए रिश्वत की मांग और आरोपी से उसका स्पष्ट संबंध विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित होना चाहिए। अदालत के फैसले का मुख्य आधार यह रहा कि केवल बिचौलिए से रकम बरामद होना और उसके यह कहने से कि उसने अधिकारी की ओर से रकम ली थी, आरोपी अधिकारी के खिलाफ अपराध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता।