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पटना: भरत तिवारी एनकाउंटर राजनीतिक स्टंट के दरवाजे दस्तक देने लगा है। वह भी यह जानते कि भरत तिवारी किसी जाति विशेष या फिर जाति आधारित मुद्दा को ले कर अधिकारियों पर दवाब नहीं बनाया रहे थे। भरत तिवारी के सामाजिक कार्य करने का दायरा भले छोटा हो, पर उद्देश्य बड़ा और सराहनीय था। पर यह बिहार की राजनीति का दुर्भाग्य है कि राजनीति के बड़े खिलाड़ी संकीर्ण मानसिकता के साथ भरत तिवारी की मौत को सत्ता के विरुद्ध या सत्ता के साथ वाले संघर्ष में बदल चुके हैं। इस संघर्ष में भरत तिवारी के संघर्ष और संघर्ष के गलत तरीके (हथियार उठाना) से सबक लेने के बजाय हर दिन जातीय विषवमन किया जाने लगा है। इसकी बानगी 5 जुलाई को जगदीशपुर के लाल बिहारी सिंह टोला हाईस्कूल मैदान में बहुजन महापंचायत के रूप में दिखेगा। सवाल यह है कि जिस बहुजन महापंचायत पर अभी से सवर्ण माइनस बहुजन का आरोप लगने लगा है, वह सत्ता के समीकरण के साथ खड़ा या सत्ता के विरुद्ध समीकरण का आगाज करने वाला है?

समाज में महापंचायत का मतलब

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन का हक है, लेकिन महापंचायत का स्वरूप इतना स्व-केंद्रित वह भी राजनीति पर सवार हो गई है कि उसे भी अब समाज में शुद्ध राजनीति करार दिया जाने लगा है। इसमें दो तरह के लोग शामिल होते हैं ।एक वो जिनका परोक्ष लाभ होता है दूसरा वो जो अपरोक्ष लाभ के लिया संख्या बल बनाते हैं। अब तो महापंचायत को राजनीति का ही एक नया रूप मान लिया गया है। उसका रूप जातीय या फिर वर्ग की ताकत दिखा कर उस जाति या उस वर्ग के नेता अपनी राजनीति चमकाते हैं। फिर वो सत्ता के साथ या सत्ता के विरुद्ध खड़े होते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि महापंचायत से लोगों की समस्या हल नहीं होती बल्कि एक राजनीतिक जमीन तैयार की जाती है।

महापंचायत ने गहरी की जातीय राजनीति की लकीर

भरत तिवारी एनकाउंटर के बाद जिस तरह से सवर्ण नेताओं ने भरत तिवारी के एनकाउंटर के विरुद्ध पुलिस को हत्यारा घोषित करना शुरू किया, उसी दिन से भरत तिवारी की लाश पर जातीय राजनीति का रंग चढ़ने लगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री आर के सिंह, अश्वनी चौबे, मंत्री विजय कुमार सिन्हा, प्रशांत किशोर, पवन सिंह जैसे नेताओं ने अपने अपने तरीके से पुलिस को गलत ठहराने की जो कोशिश की। इसके बाद उनके खिलाफ पिछड़ों के नेताओं ने सवाल खड़ा करना शुरू किया कि अगर यह एनकाउंटर फर्जी है तो शेष एकाउंटर सही कैसे? लेकिन सवर्ण के छोटे बड़े नेताओं के लिए दर्शन स्थली बनता बिलौटी गांव कहीं न कहीं जातीय लकीर को निरंतर गहरा करने लगा। इस जातीय लकीर को और भी गहरा करता गया वो वीडियो जिसमें सीधे-सीधे राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को निशाना बना कर विरोध नहीं बल्कि अभद्र शब्द कहे जाने लगे। काफी तीखे तीखे बयान आने लगे। तभी से अंदाजा लग गया कि बिहार को एक बार फिर अगड़े बनाम पिछड़े की लड़ाई में झोंकने की तैयारी हो गई है।

बहुजन महापंचायत से तीखे होंगे विवाद

भरत तिवारी एनकाउंटर के मामले की दुर्दशा तो उसी दिन शुरू हो गई जब महापंचायत को भरत तिवारी समर्थक और बहुजन महापंचायत को विरोधी खेमा घोषित कर दिया गया। यह दीगर कि इस बहुजन पंचायत को बहुजन समाज की एकजुटता से जोड़ कर देखा जा रहा है। पर इसके साथ सवाल तो यह भी खड़ा हो रहा है कि किसके विरुद्ध? अब देखिए कि इस बहुजन पंचायत में शामिल कौन-कौन शख्स हो रहे हैं।

  • पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि: पूर्व केंद्रीय मंत्री नागमणि ने भरत तिवारी एनकाउंटर को कुत्ता बिलाई से जोड़ते कहा कि भरत तिवारी क्रिमिनल था और मारा गया, बात खत्म। नागमणि भी 5 जुलाई को जगदीशपुर में आयोजित बहुजन समाज महा पंचायत शामिल होंगे। दंभ और रौब दिखाने के लिए कुशवाहा समाज के साथ 500 गाड़ी के साथ नागमणि राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मजबूत करेंगे।
  • केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी : इस बहुजन महापंचायत में केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी भी जा रहे है और वे भी इस मानसिकता के साथ भरत तिवारी एक अपराधी था। उनका कहना है कि अगर कोई उन पर रिवॉल्वर ताने, तो उसे छोड़ने का सवाल ही नहीं उठता। पुलिस ने इस मौके पर भरत तिवारी का एनकाउंटर किया तो कोई अपराध नहीं किया। पुलिस ने इस मामले में कोई बर्बरता भी नहीं की है। इसके अलावा सवर्णों के खिलाफ हमेशा अभद्र भाषा का प्रयोग करने वाले गोल्डेन दास भी बहुजन महापंचायत के आयोजकों में से एक हैं। इस शख्स पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और वे कई बार जेल जा चुके हैं।

पोस्टर काफी है बहुजन महापंचायत के लिए

बहुजन महापंचायत के पोस्टर से इस बात का अंदाजा हो गया कि उनका परोक्ष और अपरोक्ष निशाना कहां है? महापंचायत के सर्वाधिक चर्चित पोस्टर में भगवान बुद्ध, सम्राट अशोक, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान और मुलायम सिंह यादव जैसे हस्तियों की तस्वीर लगाई गई है। उनके इस पोस्टर ने एक सवर्ण और पिछड़ा जाति के बीच स्पष्ट लकीर खींच दी है। सबसे ज्यादा तनाव और विद्वेष तो वह पोस्टर कायम कर रहा है, जिस पोस्टर में स्पष्ट रूप से भरत तिवारी के श्राद्ध तक को अल्टीमेटम दिया गया। लेकिन लालू प्रसाद यादव की तस्वीर के उलट यादव समाज का एक बड़ा तबका ही इस पंचायत का सोशल मीडिया विरोध कर रहा है।