नई दिल्ली: यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के 10 साल पूरे हो गए हैं। इसकी शुरुआत 2016 में हुई थी और आज यह दुनिया का सबसे बड़ा रियल टाइम पेमेंट सिस्टम है। 2016-17 में सालाना यूपीआई ट्रांजैक्शन 1.78 करोड़ था जो 2025-26 में 24,1620 करोड़ पहुंच गया। यानी 10 साल में इसमें करीब 13,000 गुना बढ़ोतरी हुई है। इस दौरान ट्रांजैक्शन वैल्यू 0.07 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर 314 ट्रिलियन रुपये पहुंच चुकी है। आज यूपीआई 11 देशों में ऑपरेशनल है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी UPI के 10 साल पूरे होने पर एक्स पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने कहा, ’10 साल पहले UPI की शुरुआत भारत की डिजिटल पेमेंट यात्रा में एक "बड़ा मोड़" साबित हुई। UPI का दायरा और पहुंच ऐसी है कि हर भारतीय को इस पर गर्व होना चाहिए। मुझे अपने UPI अनुभव के बारे में बताएं और यह भी कि इसने आपकी जिंदगी पर क्या असर डाला।’
किसने किया था पहले ट्रांजैक्शन?
11 अप्रैल, 2016 को RBI के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के तत्कालीन एमडी और सीईओ ए पी होता को ₹5,000 ट्रांसफर करके पहला यूपीआई ट्रांजैक्शन किया था। अगस्त 2016 में इसे आधिकारिक रूप से आम लोगों के लिए लॉन्च किया गया था। आज दुनिया में होने वाले हर दो रियल-टाइम पेमेंट में से लगभग एक UPI प्लेटफॉर्म पर होता है।
नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) के फाउंडिंग चीफ ए पी होता का कहना है कि यूपीआई का आइडिया IMPS के इस्तेमाल को बढ़ाने की चुनौती से उपजा था। IMPS एक रियल-टाइम पेमेंट प्लेटफॉर्म था जिसे ATM ट्रांजैक्शन के लिए बनाए गए नेशनल फाइनेंशियल स्विच इन्फ्रास्ट्रक्चर को नए सिरे से इस्तेमाल करके बनाया गया था। इसमें बैंक अकाउंट से रियल-टाइम डेबिट की जरूरत होती थी।
कैसे आया था आइडिया?
IMPS से पहले, इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट का तरीका काफी हद तक पारंपरिक पेमेंट जैसा ही था, जिसमें ट्रांजैक्शन बैच में होते थे। टीओआई के मुताबिक होता ने कहा कि शुरुआती बातचीत से पता चला कि मर्चेंट को तुरंत पैसे मिलने की जरूरत थी, जो कार्ड से संभव नहीं था। हालांकि IMPS से P2P ट्रांसफर मुमकिन था, लेकिन इसे उन ग्राहकों के लिए डिजाइन नहीं किया गया था जो पैसे निकालना चाहते थे।
होटा ने कहा, ‘UPI की शुरुआत IMPS को नए सिरे से डिजाइन करने की कोशिश के तौर पर हुई थी, ताकि मर्चेंट पेमेंट को आसान बनाया जा सके, गैर-बैंक पेमेंट प्रोवाइडर को शामिल किया जा सके, ई-कॉमर्स पेमेंट फेलियर को कम किया जा सके और ओपन-सोर्स टेक्नोलॉजी और API को अपनाया जा सके। इन्हीं उद्देश्यों की वजह से हम IMPS से हटकर एक बिल्कुल नया सॉल्यूशन बनाने की ओर बढ़े, जिसमें सिर्फ इसके भरोसेमंद रियल-टाइम सेटलमेंट इंजन को बरकरार रखा गया।’
कैसे हुआ हिट?
होटा ने कहा, ‘प्रमोद वर्मा इसमें शामिल हुए, जबकि नंदन नीलेकणि पहले से ही हमारे टेक्नोलॉजी और पब्लिक पॉलिसी सलाहकार के तौर पर हमारे साथ थे। प्रमोद और नंदन ने पूरे सिस्टम को API-आधारित बनाने का विचार रखा, जिसमें थर्ड-पार्टी एप्लीकेशन सर्विस प्रोवाइडर शामिल हों।’ NPCI के मौजूदा चीफ दिलीप असबे लॉन्च के समय COO थे। उन्होंने पिछले साल अगस्त में वर्मा के साथ एक पॉडकास्ट में इसके डिजाइन के बारे में बताया था।
उन्होंने कहा कि UPI का इतना बड़ा पैमाना इसलिए बन पाया क्योंकि इसे एक बड़े डेटाबेस वाले सेंट्रलाइज्ड एप्लीकेशन के तौर पर नहीं, बल्कि एक डीसेंट्रलाइज्ड, ओपन प्रोटोकॉल के तौर पर डिजाइन किया गया था। यह इसमें शामिल बैंकों के बीच रियल-टाइम में पेमेंट एड्रेस को रिजॉल्व करता है। यूपीआई ट्रांजैक्शन अब तक मुफ्त है लेकिन सरकार अब इस पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगा सकती है।



