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इस्लामाबाद: भारत की रक्षा रणनीति में ऐसी कौन सी खामियां हैं जिन पर पड़ोसी देश पाकिस्तान करीब से नजर गड़ाए बैठा है? पाकिस्तान के दो प्रमुख रणनीतिक दस्तावेज सामने आए हैं जिनमें भारत की 6 बड़ी कमजोरियों पर चर्चा की गई है। पाकिस्तानी दस्तावेज में भारतीय सेना की 6 बड़ी रणनीतिक कमजोरियों का जिक्र किया गया है। इन पेपर्स में भारत की उन कथित रणनीतिक कमजोरियों का बारीक विश्लेषण किया गया है जिनका फायदा पाकिस्तानी सेना उठा सकती हैं।

पाकिस्तान की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी के जर्नल ‘मार्गाला पेपर्स’ में ये दोनों रिसर्च पेपर्स प्रकाशित किया गया है जिसका शीर्षक है ‘वेपनाइज़िंग इन्फॉर्मेशन: अ स्टडी ऑफ़ डिसइन्फॉर्मेशन एंड इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर बिटवीन इंडिया एंड पाकिस्तान’। गुल-ए-अरीबा और अहमद वकास वहीद ने इस रिसर्च पेपर को लिखा है और इस पेपर में 2019 के पुलवामा संकट और मई 2025 के टकराव के दौरान चले सूचना युद्ध का विश्लेषण करने के लिए ‘सोशल कंस्ट्रक्टिविस्ट’ यानि सामाजिक रचनावादी तरीके का इस्तेमाल किया गया है।

दूसरा पेपर ‘पॉलिटिकल कंस्ट्रक्शन ऑफ आत्मनिर्भरता अंडर मोदी: चैलेंजेज एंड कंस्ट्रेंट्स’, ‘स्ट्रैटेजिक पर्सपेक्टिव्स’ है जिसे कुछ दिनों पहले प्रकाशित किया गया है। इसमें भारत की आत्मनिर्भरता की नीति से जुड़ी बातों का विश्लेषण करने के लिए उसी तरह के ‘सोशल कंस्ट्रक्टिविस्ट’ नजरिए का इस्तेमाल किया गया है। इन दोनों पेपर्स में जिस बात पर सबसे ज्यादा फोकस किया गया है वो है नैरेटिव युद्ध।

पाकिस्तानी थिंक टैंक की नजर में भारत के ‘स्ट्रैटेजिक गैप्स’ क्या हैं?

1. सिर्फ खंडन न करें अपना रिकॉर्ड बनाएं- भारत को नैरेटिव युद्ध की काफी आक्रामक तैयारी करनी चाहिए। अपनी रणनीतिक सोच की आलोचनाओं का भारत सबसे अच्छा जवाब ठोस रिसर्च के ज़रिए दे सकता है, जिसमें पाकिस्तान पर भी ऐसे ही आरोप दर्ज हों। उदाहरण के लिए, लेफ्टिनेंट जनरल डी.एस. हुड्डा और लेफ्टिनेंट कर्नल पवित्रन राजन का ‘2026 बियॉन्ड द काइनेटिक’ पेपर आज के दौर के ‘इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर’ की गहरी समझ देता है जो तेजी से सोशल-टेक्निकल-कॉग्निटिव सिस्टम पर निर्भर होता जा रहा है। इसी तरह ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन ने 2025 में पाकिस्तान के इन्फॉर्मेशन-वॉरफेयर इकोसिस्टम और भारत पर इसके असर के बारे में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

2. बड़ी रणनीतिक संपत्ति है विश्वसनीयता- संकट के समय एक भी भ्रामक आधिकारिक बयान या बिना पुष्टि वाला ट्वीट सालों तक दुश्मनों के नैरेटिव को हवा दे सकता है। इसलिए सिर्फ अपनी बात ज्यादा लोगों तक पहुंचाना काफी नहीं है बल्कि संचार की विश्वसनीयता बढ़ाना सबसे जरूरी है। आधिकारिक जानकारी को ऐसे माध्यमों से शेयर किया जाना चाहिए जहां पत्रकार और शोधकर्ता उसकी पुष्टि कर सकें। जब जानकारी का सत्यापन हो जाता है तो वह प्रोपेगेंडा का ज्यादा मजबूती से सामना कर पाती है। काउंटर-नैरेटिव हमेशा समय पर और आसानी से सत्यापित होने योग्य होने चाहिए।
3. कमियों पर बहस करने के बजाय उन्हें दूर करें- भारत की रक्षा-औद्योगिक नीति की आलोचनाओं में कई कड़वे सच भी छिपे होते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कैग (CAG) की रिपोर्ट्स में रक्षा खरीद और आरएंडडी (R&D) प्रोजेक्ट्स में देरी और बजट से ज्यादा खर्च होने के कई उदाहरण हैं। जैसे 2015 की सीएजी ऑडिट में बताया गया था कि डीआरडीओ (DRDO) के सभी 14 मिशन मोड प्रोजेक्ट्स में देरी हुई या बजट पार हो गया। भारत को अपनी इन रक्षा-उद्योग की कमजोरियों को दूर करके अपनी साख बचानी चाहिए। इसके साथ ही तकनीकी आत्मनिर्भरता के ऐसे उदाहरण पेश करने चाहिए जिन्हें साबित किया जा सके। पाकिस्तानी रिसर्च पेपर्स में इस कमी का जिक्र किया गया है।
4. आत्मनिर्भरता को रणनीतिक संदर्भ में समझाएं- भारत का ‘आत्मनिर्भरता’ अभियान सीधे तौर पर पीएम मोदी की राजनीतिक छवि से जुड़ा है। पाकिस्तानी विश्लेषक अक्सर इसे केवल घरेलू राजनीति का हिस्सा मानते हैं और भारत की सैन्य-औद्योगिक कमियों को उजागर करते हैं। हालांकि वे रणनीतिक साझेदारी बनाने और तीसरे देशों को महत्वपूर्ण तकनीक की सप्लाई करने जैसी भारत की उपलब्धियों को नजरअंदाज कर देते हैं। भारत अपनी सैन्य-औद्योगिक क्षमताओं का जितना ज्यादा प्रदर्शन करेगा आत्मनिर्भरता को लेकर उतना ही भ्रम दूर होगा।

5. सूचना-क्षेत्र की कूटनीति के लिए तैयारी करें- आने वाले समय में भ्रामक जानकारी और रणनीतिक धोखा भारत की कूटनीति को काफी प्रभावित करेगा। इसलिए भारत को सूचना के क्षेत्र में विश्वास कायम करने के लिए अपनी रणनीतिक नीतियां स्पष्ट करनी होंगी। भविष्य में भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वास बहाली के उपायों (CBMs) में प्रोपेगेंडा को रोकने के लिए संयुक्त आयोग बनाने जैसे कदम शामिल हो सकते हैं। गलत सूचनाओं पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए भी तंत्र विकसित करना जरूरी होगा। दोनों देशों को जानकारी को वेरिफाई करने के लिए ठोस उपाय विकसित करने चाहिए।

6. विश्वसनीय सत्यापन क्षमता का निर्माण करें- आजकल डीपफेक, वीडियो और तस्वीरें कुछ ही घंटों में वायरल हो जाती हैं जो रणनीतिक फैसलों पर भारी असर डाल सकती हैं। ऐसे में जमीनी सबूतों की आधिकारिक स्तर पर बहुत बारीकी से फैक्ट-चेकिंग होनी चाहिए। विदेशी सरकारों, पत्रकारों और शोधकर्ताओं को भारत की इस सत्यापन प्रक्रिया पर पूरा भरोसा होना चाहिए। इसके लिए भारत को तकनीकी सत्यापन विशेषज्ञता विकसित करने में निवेश करना होगा। साथ ही ग्लोबल स्टैंडर्ड को पूरा करने के लिए अकादमिक, मीडिया और अंतरराष्ट्रीय फैक्ट-चेकिंग संस्थाओं के साथ जुड़ना होगा।