प्रभंजन वर्मा (नई दिल्ली): भारतीय क्रिकेट में आलोचना नई बात नहीं है। लेकिन, सोशल मीडिया के दौर में आलोचना और भड़ास निकालने के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। कुछ खराब मैच, तीन-चार महंगे स्पेल या बैटिंग ऑर्डर में कुछ अप्रत्याशित हेरफेर कोच व सेलेक्टर को कटघरे में खड़ा करने के लिए काफी हैं।
निशाने पर गंभीर | अभी गौतम गंभीर के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है। उन पर टीम में जरूरत से ज्यादा बदलाव करने, खिलाड़ियों को अलग-अलग पोजीशन पर खिलाने और गुरनूर बरार जैसे युवा गेंदबाजों को औसत प्रदर्शन के बावजूद लगातार मौके देने पर सवाल उठ रहे हैं। पहले इंग्लैंड के खिलाफ मिली बड़ी सीरीज हार और फिर वेस्टइंडीज को बड़ा स्कोर खड़ा करने से रोकने में मिली असफलता का ठीकरा उनके फैसलों पर फोड़ा जा रहा है।
गुरनूर इसलिए | गुरनूर बरार का ही केस ले लीजिए। उनको मौका देने के पीछे मजबूत आधार है। वह 6.5 फुट के तेज गेंदबाज हैं, 140-145 kmph की गति से गेंद डाल सकते हैं, हिट द डेक बॉलर हैं, जो हार्ड लेंथ से बाउंस निकालने की क्षमता रखते हैं। यह स्किल दक्षिण अफ्रीका की पिचों के लिए मुफीद है, जहां अगले साल वनडे विश्व कप होना है। मत भूलिए कि भारत के बॉलिंग कोच मॉर्ने मोर्कल हैं, जो उन कंडीशन्स को अच्छे से जानते हैं।
सबकी भूमिका | आज भारत के पास प्रतिभा की कोई कमी नहीं। चुनौती है उन खिलाड़ियों को तलाशना, जो परिस्थितियों के मुताबिक जन्मे रोल में बिल्कुल फिट बैठते हों। अभिषेक शर्मा और वैभव सूर्यवंशी जैसे खिलाड़ियों को बेखौफ खेलने की आजादी इसलिए मिलती है, क्योंकि श्रेयस अय्यर और तिलक वर्मा टीम को इंश्योरेंस देते हैं। यानी आज के दौर में हर खिलाड़ी को एक जगह नहीं, एक भूमिका जीतनी है।
फिर समीक्षा | अजीत अगरकर के कार्यकाल को गौर से देखने की जरूरत है। अलोकप्रिय फैसलों के लिए कई बार उन्हें आलोचना झेलनी पड़ी, लेकिन गंभीर ने उनकी सराहना की है। भारत ने उनके कार्यकाल में 2024 टी20 वर्ल्ड कप, 2025 चैंपियंस ट्रॉफी और 2026 टी20 वर्ल्ड कप जीते। गंभीर और अगरकर ने शायद यह समझ लिया कि हर मैच को वर्ल्ड कप फाइनल की तरह खेलने का कोई अर्थ नहीं। फुटबॉल में राष्ट्रीय टीमें फ्रेंडली मैचों में अपना कॉम्बिनेशन आजमाती हैं। हमें द्विपक्षीय सीरीज को इसी नजर से देखना चाहिए।
AI सारांश
- द्विपक्षीय सीरीज में हार-जीत से ज्यादा जरूरी भविष्य के बड़े टूर्नामेंट के लिए सही टीम तैयार करना है। कोच गंभीर यही काम कर रहे।
- खिलाड़ी नहीं, भूमिका अहम है। टीम की सफलता के लिए हर खिलाड़ी का परिस्थितियों के मुताबिक अपनी भूमिका निभाना जरूरी है।
- नए खिलाड़ियों को आजमाने और विकल्प तैयार करने के लिए टीम मैनेजमेंट को प्रयोग की छूट मिलनी चाहिए।



