इजरायल को युद्ध और संघर्षो के बीच जीने की आदत है। उसके गठन के बाद से शायद ही कोई ऐसा दौर आया हो, जब वह किसी युद्ध, सैन्य अभियान या क्षेत्रीय टकराव में शामिल न रहा हो। आलोचक कहते हैं कि यदि उसके बस में हो तो वह फिलस्तीनी पहचान को इतिहास से मिटा दे। उसने कभी पश्चिम एशिया का पेरिस कहलाने वाले बेरूत को मानो खंडहर बना दिया है। हिजबुल्लाह के खिलाफ अभियानों के नाम पर दक्षिणी लेबनान को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। सीरिया भी समय-समय पर उसके हमलों की चपेट में रहा है। ऐसे उदाहरणों की सूची और लंबी है।
पश्चिम एशिया संकट
दूसरी तरफ, इजरायल का पक्ष रखने वाले तर्क देते हैं कि उसके चारों ओर ऐसे विरोधी मौजूद हैं, जो उसके अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करते। हमास, हिजबुल्लाह और हूती जैसे संगठन लंबे समय से उसके लिए सुरक्षा चुनौती बने हुए हैं। पूरे क्षेत्र में इजरायल ही एकमात्र लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है, लेकिन वह तानाशाही सत्ताओं और कट्टरपंथी संगठनों से घिरा हुआ है। इसी तर्क के आधार पर यह धारणा भी बनाई गई कि अमेरिका के सहयोग के बिना इजरायल का टिक पाना मुश्किल होगा।
महाशक्तियों की लड़ाई
यह भी कहा जाता रहा है कि अमेरिकी सीनेट और कांग्रेस पर इजरायल समर्थक लॉबी का इतना प्रभाव है कि मध्य-पूर्व से जुड़ी अमेरिकी नीतियां उसी के इर्द-गिर्द घूमती हैं। इन सबके बीच पश्चिम एशिया दशकों से अस्थिरता का मैदान बना हुआ है। लाखों लोग विस्थापित हुए, अनगिनत परिवार उजड़ गए और आतंकवादी संगठनों ने अराजकता का लाभ उठाकर अपनी जड़ें मजबूत की। कई सरकारें गिरीं, नई कई सरकारें गिरीं, नई व्यवस्थाएं उभरीं और यह क्षेत्र महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया। तेल, ऊर्जा और व्यापारिक मार्गों के कारण अमेरिका, रूस और चीन समेत सभी बड़ी शक्तियों की निगाहें इस क्षेत्र पर टिकी रहीं।
उलझे हुए समीकरण
गौर करने वाली बात यह है कि पश्चिम एशिया की बिसात केवल इजरायल और ईरान तक सीमित नहीं। ये दोनों देश तो सिर्फ मोहरे हैं। इसे साम्राज्यवाद 2.0 कह सकते हैं। आर्थिक प्रभाव, वैचारिक टकराव और क्षेत्रीय गठबंधनों के जरिए बड़ी शक्तियां लंबे समय से अपना प्रभाव बनाए रखती आई हैं। इजरायल और ईरान इसी सिक्के के दो पहलू प्रतीत होते हैं।
ट्रंप ने बदली चाल
अब बदलते हुए परिदृश्य में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक अलग भूमिका में दिखाई देते हैं। उनके समर्थकों का दावा है कि उन्होंने हमास और हूती जैसे समूहों को कमजोर करने व क्षेत्रीय समीकरणों को बदलने की कोशिश की है। हिजबुल्लाह अब भी चर्चा के केंद्र में है, लेकिन ट्रंप कई मौकों पर नेतन्याहू की सार्वजनिक आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने यह संकेत भी दिया है कि अमेरिकी समर्थन के बिना इजरायल की स्थिति कही अधिक
मुश्किल हो सकती है।
नई व्यवस्था
जी-7 की चर्चाओं के दौरान ट्रंप ने यह भी कहा कि लेबनान में हिजबुल्लाह से जुड़े मुद्दों को संभालने में सीरिया की भूमिका अधिक प्रभावी हो सकती है। सीरिया में आज अहमद अल- शरा की सरकार है, जो कभी अलकायदा से जुड़े रहे थे। ऐसे बयानों के जरिए ट्रंप संकेत देते दिखते हैं कि पश्चिम एशिया की राजनीति में इजरायल की भूमिका अब पहले जैसी निर्विवाद नहीं रही।
अब संघर्ष क्यों
नेतन्याहू के लिए राजनीतिक चुनौतियां कम नहीं हैं। सवाल यह भी उठता है कि यदि पश्चिम एशिया में इजरायल के सामने कोई बड़ा दुश्मन नहीं बचा, तो वह लगातार संघर्ष की राह पर क्यों बना हुआ है? नेतन्याहू कई बार खेल पलटने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन ट्रंप एक-एक कर उनके विकल्प सीमित करते दिख रहे हैं।
नेतन्याहू की मुश्किल
अब तक इजरायल फिलस्तीनी खतरे का हवाला देकर अपनी सैन्य और राजनीतिक कार्रवाइयों को जायज ठहराता आया था, पर गाजा को लेकर ट्रंप का नजरिया अलग दिखाई देता है। ईरान के साथ हुई सौदेबाजी में भी इजरायल को शामिल नहीं किया गया। ट्रंप यह संदेश देते दिखते हैं कि हर समस्या का समाधान सैन्य कार्रवाई नहीं है, संवाद और कूटनीति से भी संभव है। इजरायल में अक्टूबर में चुनाव, गठबंधन सरकार, भ्रष्टाचार के मुकदमों के बीच वॉशिंगटन से टकराव नेतन्याहू के लिए महंगा पड़ सकता है।
मुनाफे का खेल
ऐसा लगता है कि ट्रंप पश्चिम एशिया में दशकों से चले आ रहे संघर्षो को समाप्त करना चाहते हैं। उनका मानना है कि इन टकरावों का लाभ किसी और को मिलता रहा है। वह क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी कम करने और खाड़ी देशों, इजरायल-ईरान को एक नए संतुलन में देखने के पक्षधर नजर आते हैं। आखिर AI और डेटा सेंटरों के बढ़ते दौर में पश्चिम एशिया की ऊर्जा व शांति, दोनों की अहमियत बढ़ गई है।



