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बायोप्सी में ब्रेस्ट कैंसर पॉजिटिव आ जाए, तो उसके बाद इलाज कैसे होता है? इस बारे में डॉक्टर सुशांत मित्तल ने विस्तार से बताया। उनके अनुसार, सर्जरी, कीमो आदि के दौरान मरीज को कुछ साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है जैसे शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होना, बालों का झड़ना, भूख में कमी आ जाना आदि। डॉक्टर के अनुसार, जितनी जल्दी कैंसर के बारे में मालूम चलेगा, उतना ज्यादा उसे प्रभावी तरीके से मैनेज किया जा सकेगा। इसके लिए बेहद जरूरी है कि शुरुआती लक्षणों को बिल्कुल भी नजरअंदाज न किया जाए और जागरूक रहते हुए टेस्ट और टाइमली ट्रीटमेंट शुरू करवाए जाएं।

कैसे पता लगाया जाता है ब्रेस्ट कैंसर है या नहीं?

शुरुआती लक्षण जैसे स्तन में गांठ, त्वचा में बदलाव या निप्पल से डिस्चार्ज नजर आएं, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं। ब्रेस्ट कैंसर का निदान सबसे पहले डिटेल कंसल्टेशन से शुरू होता है। डॉक्टर मरीज की मेडिकल हिस्ट्री पूछता है, साथ ही ये जानने की कोशिश करता है कि फैमिली में पहले किसी को ये कैंसर हुआ है। इसके बाद फिजिकल एग्जामिनेशन किया जाता है और उसके बाद टेस्ट सुझाए जाते हैं। इन टेस्ट्स में आमतौर पर मुख्य रूप से बायोप्सी, मैमोग्राफी, अल्ट्रासाउंड, और कभी-कभी MRI या PET स्कैन शामिल होते हैं।

  • बायोप्सी: इसमें गांठ या फिर ब्रेस्ट के उस हिस्से की टिशूज का नमूना लिया जाता है, जहां कैंसर की मौजूदगी का शक होता है। लैब के टेस्ट के बाद ही ये साफ हो पाता है कि सेल्स कैंसरस हैं या नहीं।
  • मैमोग्राफी: मैमोग्राफी के दौरान मरीज को खास एक्स-रे मशीन के सामने खड़ा किया जाता है और एक-एक करके प्लेट लगाते हुए ब्रेस्ट टिशूज को स्कैन किया जाता है।
  • अल्ट्रासाउंड: इसमें मरीज के ब्रेस्ट्स पर जेल लगाने के बाद ट्रांसड्यूसर मशीन का इस्तेमाल किया जाता है, जो साउंड फ्रीक्वेंसी के जरिए टिशूज की स्क्रीन पर रियलटाइम इमेज बनाता है।
  • MRI और PET: MRI के लिए शरीर में डाई और PET के दौरान रेडियोएक्टिव ट्रेसर थोड़ी मात्रा में इंजेक्ट किया जाता है। इसके बाद मरीज को लिटाकर मशीन में ले जाया जाता है। MRI ब्रेस्ट टिशू का डिटेल्ड स्ट्रक्चर दिखाता है, तो वहीं PET के जरिए ये मालूम चलता है कि कैंसर कितना फैल चुका है।

इन रिपोर्ट्स के आधार पर जब कैंसर की मौजूदगी, स्टेज और प्रकार तय हो जाता है, तो उसके बाद ट्रीटमेंट प्लान निर्धारित किया जाता है।

कैसे किया जाता है ब्रेस्ट कैंसर का इलाज?

ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में क्या-क्या शामिल किया जाएगा ये कैंसर के प्रकार और स्टेज पर निर्भर करता है। ट्रीटमेंट में कई विकल्प शामिल होते हैं।

सर्जरी

आमतौर पर सबसे पहले सर्जरी का ऑप्शन चुना जाता है, जिससे क्रैंसर इंफेक्टिड टिशूज को हेल्दी टिशूज से अलग कर बाहर निकाला जा सके। सर्जरी के दौरान लंपेक्टॉमी या फिर मैस्टेक्टॉमी के विकल्पों को शामिल किया जाता है। लंपेक्टॉमी में सिर्फ गांठ निकाली जाती है, तो वहीं मैस्टेक्टॉमी में पूरा स्तन या उसका एक बड़ा हिस्सा रिमूव होता है।

ट्रीटमेंट की अवधि: सर्जरी की अवधि फिक्स नहीं होती, क्योंकि ये कैंसर के स्केल से लेकर कॉम्प्लिकेशन्स जैसी कई चीजों पर निर्भर करती है। ऑपरेट होने के बाद सामान्यत: रिकवरी में 2 से 4 सप्ताह लगते हैं। इस दौरान घाव की देखभाल और आराम करना जरूरी होता है।

कीमो थेरेपी

इसमें दवाओं के जरिए कैंसर सेल्स को नष्ट किया जाता है। आमतौर पर सर्जरी से पहले कीमो करते हुए नेओएडजुवेंट या बाद में एडजुवेंट दिए जाते हैं।

ट्रीटमेंट की अवधि: कीमोथेरेपी आमतौर पर 3 से 6 महीनों तक चलती है। इस दौरान मरीज की इम्यूनिटी का विशेष ध्यान रखा जाना जरूरी है।

रेडिएशन थेरेपी

रेडिएशन थेरेपी के जरिए सर्जरी के बाद बचे हुए कैंसर सेल्स को हाई इंटेंसिटी रेज द्वारा नष्ट किया जाता है।

ट्रीटमेंट की अवधि: रेडिएशन थेरेपी 3 से 6 सप्ताह तक दी जा सकती है। इस दौरान स्किन की ज्यादा देखभाल करना अहम है।

हार्मोनल थेरेपी

ब्रेस्ट कैंसर के कुछ प्रकार हार्मोन सेंसेटिव होते हैं। ऐसे मामलों में हार्मोनल थेरेपी के जरिए कैंसर प्रभावित सेल्स की बढ़ने की क्षमता को धीमा करने या फिर रोकने की कोशिश की जाती है।

ट्रीटमेंट की अवधि: हार्मोनल थेरेपी लंबी होती है। ये 5 से लेकर 10 साल तक चल सकती है।

टार्गेटेड थेरेपी

ये नई तरह की टेक्नीक है। इसमें कैंसर सेल्स को खासतौर पर निशाना बनाते हुए उनके विकास को रोकने वाली दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है।

ट्रीटमेंट की अवधि: टार्गेटेड थेरेपी कुछ महीनों से लेकर एक साल तक चल सकती है।

हर ट्रीटमेंट के बाद डॉक्टर द्वारा दी गई सलाह और सावधानियों का ख्याल रखना, नियमित फॉलो-अप लेना और हेल्दी डाइट एंड लाइफस्टाइल से जुड़ी आदतों को डालना जरूरी होता है।

ट्रीटमेंट के दौरान आने वाली चुनौतियां

फिजिकल चैलेंज

ब्रेस्ट कैंसर के ट्रीटमेंट के दौरान मरीज को हमेशा थकान बने रहना, बाल झड़ना, उल्टी होना, कमजोरी आना, भूख कम हो जाना और स्किन बहुत ज्यादा सेंसेटिव हो जाने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

क्या करे मरीज: ब्रेस्ट कैंसर के दौरान इन साइड इफेक्ट्स का दिखना आम है। इन्हें दवाओं, न्यूट्रिशन, पर्याप्त आराम और मेडिकल केयर के जरिए काफी हद तक काबू किया जा सकता है। इसलिए ये बेहद जरूरी है कि मरीज कोई भी चीज छिपाए ना और खुलकर अपनी स्थिति डॉक्टर के साथ साझा करे।

मेंटल और इमोशनल चैलेंज

कैंसर से लड़ाई मेंटल और इमोशनली काफी ज्यादा चुनौतीपूर्ण होती है। हौसला बनाए रखने के लिए इस दौरान परिवार और दोस्तों का सपोर्ट बहुत ज्यादा जरूरी होता है। मेंटल सपोर्ट ग्रुप्स का सहयोग भी रिकवरी प्रोसेस में काफी सहायक साबित होता है।

क्या करे मरीज: इस दौरान पॉजिटिव बने रहना और स्ट्रेस कम रखना बेहद जरूरी है। लाइट फिजिकल एक्टिविटीज जैसे योग या वॉकिंग करना मानसिक शांति बढ़ाते हैं। फैमिली, फ्रेंड्स और मेंटल सपोर्ट ग्रुप के साथ खुलकर फीलिंग्स और एक्सपीरियंस शेयर करना भी इस टफ फेज का सामना करने और इससे निकलने में मदद करता है।

ब्रेस्ट कैंसर ट्रीटमेंट के बाद लाइफस्टाइल, डाइट और फॉलो-अप

ब्रेस्ट कैंसर के ट्रीटमेंट के बाद हेल्दी लाइफस्टाइल हेबिट्स जैसे रेग्युलर लाइट एक्सरसाइज और पर्याप्त नींद लेना रिकवरी में मदद करती हैं। वहीं हरी सब्जियां, फल और हाई प्रोटीन एंड लो फैट वाली हेल्दी बैलेंस्ड डाइट इम्यूनिटी बूस्टिंग में मददगार साबित होती है। इसके साथ ही डॉक्टर से समय-समय पर रेग्युलर फॉलो-अप लेते रहना भी अहम है, ताकि किसी भी तरह की जटिलता या कैंसर के दोबारा होने के संकेत जल्दी पकड़ में आ सकें और तुरंत उपचार शुरू किया जा सके।