Spread the love

नई दिल्ली: भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी को लंदन हाई कोर्ट से एक और बड़ा झटका लगा है। अदालत ने बैंक ऑफ इंडिया के पक्ष में फैसला सुनाते हुए नीरव मोदी को 10.7 मिलियन डॉलर (100 करोड़ रुपये से ज्यादा) का कर्ज चुकाने का आदेश दिया है। लंदन की सर्किट कमर्शियल कोर्ट के जज साइमन टिंकलर ने यह फैसला सुनाया।

यह विवाद जुलाई 2012 में बैंक ऑफ इंडिया द्वारा नीरव मोदी की दुबई स्थित कंपनी फायरस्टार डायमंड एफजेडई को दिए गए एक लोन से जुड़ा है। नीरव मोदी ने 3 अगस्त 2013 को इस लोन के लिए खुद पर्सनल गारंटी दी थी। इसका मतलब था कि अगर कंपनी लोन नहीं चुकाती तो नीरव मोदी को अपनी जेब से यह पैसा भरना पड़ता।

साल 2018 की शुरुआत में जब पंजाब नेशनल बैंक के साथ हुए हजारों करोड़ रुपये के महाघोटाले की खबर सामने आई, तब बैंक ऑफ इंडिया ने अपनी रकम सुरक्षित करने के लिए नीरव मोदी की कंपनी को दिया गया लोन तुरंत वापस मांग लिया।

कोर्ट में नीरव मोदी के खोखले दावे

लंदन की जेल में बंद नीरव मोदी ने भारत प्रत्यर्पण से बचने की लड़ाई के साथ-साथ इस केस को भी खारिज कराने की कोशिश की थी। नीरव मोदी ने अदालत में तीन मुख्य दलीलें दीं, जिन्हें जज ने सिरे से खारिज कर दिया:
1. गारंटी लागू करने योग्य नहीं है
कोर्ट ने माना कि गारंटी पूरी तरह वैध और कानूनी रूप से लागू करने योग्य है।

2. बैंक से कोई नोटिस या डिमांड लेटर नहीं मिला
नीरव मोदी ने दावा किया कि उसे अप्रैल 2018 और अक्टूबर 2025 में भेजे गए डिमांड नोटिस कभी मिले ही नहीं क्योंकि वह भारत में नहीं था। जज टिंकलर ने कहा कि बैंक ने नोटिस सीधे उस थाम्ससाइड जेल में भी भेजे थे जहां नीरव रह रहा था, इसलिए यह बहाना काम नहीं करेगा।

3. लोन खत्म करने का कोई ठोस कारण नहीं था
कोर्ट ने कहा कि फरवरी 2018 में पीएनबी घोटाले की खबर के बाद यह साफ था कि नीरव मोदी की पूरी कंपनी और उसकी पर्सनल गारंटी की वैल्यू खत्म हो चुकी थी। इसलिए बैंक का लोन वापस मांगना बिल्कुल सही था।

कोर्ट का अंतिम फैसला

जज साइमन टिंकलर ने कहा कि नीरव मोदी बैंक के प्रति अपनी पर्सनल गारंटी के तहत 4.1 मिलियन डॉलर (करीब 38.9 करोड़ रुपये) की मूल राशि चुकाने के लिए सीधे तौर पर उत्तरदायी हैं। इसके साथ ही बैंक द्वारा तय किए गए नियमों के आधार पर कैलकुलेट किया गया पूरा ब्याज भी इसमें जोड़ा जाएगा (जो कुल मिलाकर 100 करोड़ रुपये से ऊपर बैठता है)। मोदी अदालत में ऐसा कोई भी बचाव या ठोस तर्क पेश नहीं कर पाए जिससे यह साबित हो कि बैंक इस रकम का हकदार नहीं है।