मूवी रिव्यू: दायरा
‘दायरा’ की कहानी
कहानी एक मासूम युवती (प्रगति मिश्रा) की है, जो अपने भाई कबीर और मां के साथ रहती है। एक रात भाई का चश्मा लेकर घर लौट रही युवती के साथ गैंगरेप किया जाता है और फिर उसे जिंदा जलाकर बेरहमी से मार दिया जाता है। उसकी लाश सुनसान जगह पर मिलने के बाद पूरा शहर दहल उठता है। पुलिस पर आरोपियों को जल्द से जल्द पकड़कर सजा दिलाने का दबाव बढ़ जाता है। पुलिस चार आरोपियों को गिरफ्तार करती है और चारों अपना गुनाह कबूल कर लेते हैं। लेकिन कुछ ही समय बाद चारों का एनकाउंटर हो जाता है।
‘दायरा’ मूवी रिव्यू
मेघना गुलजार सामाजिक और मानवीय व्यवहार की विषमताओं की पड़ताल करने में माहिर रही हैं। ‘दायरा’ में भी वे अपने किरदारों के जरिए न्याय की दो अलग-अलग व्याख्याओं को सामने रखती हैं। एक, जो कानून और न्याय व्यवस्था पर भरोसा करता है और दूसरा, जो ‘खून का बदला खून’ को ही इंसाफ मानता है। फिल्म का पहला भाग काफी चुस्त और प्रभावी है।
करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन के किरदारों के बीच के वैचारिक संघर्ष को ज्यादा स्पेस और गहराई दी जाती, तो फिल्म का केंद्रीय सवाल कहीं ज्यादा प्रभावशाली बन सकता था। मेघना ने जुवेनाइल जस्टिस जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील मुद्दे को छुआ तो है, लेकिन उसकी गहराई में नहीं उतरतीं। हालांकि उनका रियलिस्टिक ट्रीटमेंट कहानी के पक्ष में जाता है और फिल्म को लेकर उनकी मंशा साफ नजर आती है। बावजूद इसके, क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते लगता है कि जिस वैचारिक टकराव को फिल्म ने इतने प्रभावी ढंग से स्थापित किया था, उसे उसका मुकम्मल विस्तार नहीं मिल पाया।
अभिनय की बात करें तो तेज-तर्रार तेवर वाले फिट पुलिस अफसर के किरदार में पृथ्वीराज सुकुमारन अपनी छाप छोड़ते हैं। अपने किरदार और उसकी सोच को लेकर उनका कन्विक्शन पर्दे पर साफ नजर आता है। खासकर जब वे बलात्कारियों को सबक सिखाने की बात करते हैं। उनका संयमित, लेकिन भीतर से उबलता आक्रोश किरदार को प्रभावशाली बनाता है। दूसरी ओर, ‘जाने जां’ और ‘द बकिंघम मर्डर्स’ में अपनी अदाकारी से दर्शकों का दिल जीत चुकीं करीना कपूर खान, डीसीपी अजूनी के किरदार में कुछ ज्यादा सहज नजर आती हैं। हालांकि उनके किरदार को स्क्रीनप्ले से उतनी गहराई नहीं मिलती, जितनी मिल सकती थी।
सह-कलाकारों में जितेंद्र जोशी और तृप्ति खामकर अपने प्रभावी अभिनय के कारण याद रह जाते हैं। क्षिति जोग ने मां की भूमिका में अपनी छाप छोड़ी है और बेटी को खोने के दर्द को बखूबी पर्दे पर उतारा है। बाकी कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों के अनुरूप अच्छा काम किया है।



