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रायगढ़। शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य: विविध परिदृश्य’ का 31 अक्टूबर को समापन हुआ। 30 और 31 अक्टूबर को आयोजित इस संगोष्ठी में भारत के विभिन्न राज्यों सहित सात देशों के साहित्यकारों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों ने प्रत्यक्ष एवं ऑनलाइन माध्यम से भाग लिया। कार्यक्रम में समकालीन हिन्दी साहित्य के भाषायी, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक पक्षों पर चर्चा हुई।

संगोष्ठी का आयोजन शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय और बुल्गारिया के देवम फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में किया गया।

अरुण कमल की अध्यक्षता में साहित्यिक सत्र, तेजेंद्र शर्मा ने किया कहानी-पाठ
द्वितीय दिवस के छठवें और सातवें तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कवि अरुण कमल ने की। उन्होंने छायावाद के प्रणेता पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय के साहित्यिक योगदान को याद किया और प्रस्तुत शोधपत्रों व विचारों की सराहना की।
ब्रिटेन से आए अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने अपनी चर्चित कहानी ‘गोद उतराई’ का पाठ किया। वरिष्ठ कथाकार डॉ. चन्द्रिका चौधरी ने भी अपनी कहानी के माध्यम से समकालीन सामाजिक यथार्थ और मानवीय अंतर्द्वंद्वों को प्रस्तुत किया।

स्त्री-विमर्श से प्रवासी साहित्य तक प्रमुख वक्ताओं ने रखे विचार
अकादमिक सत्रों में बुल्गारिया की डॉ. मौना कौशिक ने प्रवासी महिला साहित्यकारों के योगदान और वैश्विक साहित्य में स्त्री-अस्मिता की अभिव्यक्ति पर चर्चा की। डॉ. सुषमा देवी ने स्त्री-विमर्श में प्रतिरोध, आत्मनिर्भरता और निर्णय की स्वतंत्रता के बदलते स्वरूप पर विचार रखे।

डॉ. सौरभ सराफ ने ‘भारत विभाजन और इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यास’ विषय पर विभाजन की स्मृतियों, विस्थापन और मानवीय पीड़ा के साहित्यिक चित्रण का विश्लेषण किया। डॉ. सीमा रानी प्रधान ने निबंध, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और आत्मकथा जैसी कथेतर गद्य विधाओं की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव ने विकलांग विमर्श के संदर्भ में समाज की बढ़ती ‘बौद्धिक विकलता’ पर कटाक्ष किया। वहीं डॉ. अंकुर शुक्ला ने जनसंचार माध्यमों के प्रभाव से हिन्दी के मौलिक शब्दों के घटते प्रयोग पर चिंता जताई और भाषा की समृद्ध शब्द-संपदा को बचाए रखने की जरूरत बताई।

केंद्रीय हिन्दी निदेशालय की योजनाओं की जानकारी दी
केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय के सहायक निदेशक डॉ. दीपक पांडेय ने हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रचार-प्रसार के लिए संचालित योजनाओं की जानकारी दी। उन्होंने ‘प्रबोध, प्रवीण एवं प्राज्ञ’ पत्राचार पाठ्यक्रमों, नवलेखक शिविरों, शोधार्थी यात्रा अनुदान और हिन्दी प्रकाशनों सहित विभिन्न योजनाओं की चर्चा की।

अंतिम तकनीकी सत्र में डॉ. हेमचंद्र पाण्डेय ने जीवनी साहित्य, प्रमोद झा ने हिन्दी पत्रकारिता, अंजनी तिवारी ‘सुधाकर’ ने व्यंग्य एवं डायरी लेखन, डॉ. गजेन्द्र तिवारी ने साहित्य पर विज्ञान एवं तकनीकी के प्रभाव और डॉ. रामायण प्रसाद टंडन ने दलित एवं आदिवासी विमर्श पर विचार प्रस्तुत किए। सत्र का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. बी.के. भगत ने किया।

पहले दिन दस पुस्तकों का लोकार्पण
संगोष्ठी का उद्घाटन 30 अक्टूबर को ओ.पी. जिंदल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर.डी. पाटीदार के मुख्य आतिथ्य और शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. विनय चौहान की अध्यक्षता में हुआ। पहले दिन कवि अरुण कमल ने कविता ‘धार’ का पाठ किया। कनाडा की प्रवासी साहित्यकार डॉ. स्नेह ठाकुर ने वक्तव्य और काव्य-पाठ प्रस्तुत किया। प्रो. सुशील कुमार शर्मा ने पूर्वोत्तर संस्कृति, डॉ. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कविता और प्रो. गौरी त्रिपाठी ने समकालीन उपन्यास पर विचार रखे। इस दौरान दस पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया