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माले/इस्लामाबाद: मालदीव अपनी कमजोर अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए दक्षिण एशियाई देशों के संगठन ‘सार्क’ को फिर से शुरू करने की कोशिशें कर रहा है लेकिन उसके सारे दांव नाकाम साबित हो रहे हैं। मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने 26 जुलाई को कहा था कि उनका देश ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ (SAARC) की बैठकों को फिर से शुरू करने में मदद करने के लिए तैयार है। इसकी पिछली बैठक 12 साल पहले हुई थी।

इस समूह को एक अहम क्षेत्रीय संगठन बताते हुए मुइज्जू ने कहा था कि इलाके में शांति और स्थिरता के लिए इसे फिर से शुरू करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि SAARC सदस्य देशों को बातचीत की मेज पर वापस लाने के लिए ‘मालदीव मध्यस्थ की भूमिका निभाने को तैयार है।’ पाकिस्तान लगातार सार्क को जिंदा करने की कोशिशें कर रहा है और इससे वो देश की अर्थव्यवस्था सुधारना चाहता है लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि ‘आतंकवाद और बातचीत साथ साथ नहीं हो सकती है।’


इसके अलावा बांग्लादेश में तारिक रहमान की सरकार ने पिछले महीने इसी तरह की अपील की थी और कहा था कि इस गुट को फिर से सक्रिय करना विदेश नीति की एक मुख्य प्राथमिकता है। ढाका का तर्क था कि सार्क (SAARC) को फिर से सक्रिय करने से आर्थिक संभावनाओं का पूरा लाभ उठाया जा सकेगा, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी बढ़ेगी और सीमा-पार की साझा चुनौतियों का समाधान किया जा सकेगा।

सार्क को जिंदा करने की कोशिश में दक्षिण एशिया के कई देश

आपको बता दें कि सार्क में भारत, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका और अफगानिस्तान शामिल हैं। पाकिस्तान की आतंकवादी हरकतों की वजह से भारत ने सार्क की बैठकों में हिस्सा लेना बंज कर दिया था और इसके बाद सार्क भी नेपथ्य में चला गया। साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट की एक रिपोर्ट में ढाका यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर शफी मोहम्मद मोस्तोफा ने कहा कि सार्क को फिर से शुरू करने में सबसे बड़ी रुकावट भारत और पाकिस्तान के बीच बना गतिरोध है।

उन्होंने कहा ‘इसे सार्थक रूप से फिर से शुरू करने के लिए दोनों देशों को फिर से जुड़ने में रणनीतिक फायदे नजर आने चाहिए। फिलहाल भारत के पास ऐसा करने के लिए सीमित राजनीतिक प्रोत्साहन ही दिखता है।’ शफी के मुताबिक नई दिल्ली राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहुत जोर देती है और इस्लामाबाद को सुरक्षा के लिए लगातार बनी रहने वाली चुनौती मानती है। इसीलिए हालात सामान्य करने की दिशा में नीति में कोई बड़ा बदलाव करने से घरेलू राजनीति में नुकसान उठाना पड़ सकता है जिससे निकट भविष्य में सार्क के फिर से शुरू होने की संभावना कम ही है।’

सार्क की बैठकें क्यों बंद हो गईं?

पिछला SAARC शिखर सम्मेलन 2014 में नेपाल के काठमांडू में हुआ था जबकि अगला सम्मेलन दो साल बाद पाकिस्तान में होना था। जम्मू-कश्मीर के उरी में हुए घातक आतंकवादी हमले के बाद भारत ने इसका बहिष्कार किया और दिल्ली ने इसके लिए इस्लामाबाद को जिम्मेदार ठहराया जिसके बाद यह सम्मेलन रद्द कर दिया गया।

दिल्ली का मानना ​​है कि SAARC के नाकाम होने के लिए भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान जिम्मेदार है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पिछले महीने एक ब्रीफिंग में कहा था कि दक्षिण एशिया में हर कोई जानता है कि SAARC को बाधित करने के लिए कौन सा देश जिम्मेदार है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्रीय सहयोग के लिए सद्भावना की आवश्यकता होती है।

सार्क की बैठकें क्यों बंद हो गईं?

पिछला SAARC शिखर सम्मेलन 2014 में नेपाल के काठमांडू में हुआ था जबकि अगला सम्मेलन दो साल बाद पाकिस्तान में होना था। जम्मू-कश्मीर के उरी में हुए घातक आतंकवादी हमले के बाद भारत ने इसका बहिष्कार किया और दिल्ली ने इसके लिए इस्लामाबाद को जिम्मेदार ठहराया जिसके बाद यह सम्मेलन रद्द कर दिया गया।

दिल्ली का मानना ​​है कि SAARC के नाकाम होने के लिए भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान जिम्मेदार है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने पिछले महीने एक ब्रीफिंग में कहा था कि दक्षिण एशिया में हर कोई जानता है कि SAARC को बाधित करने के लिए कौन सा देश जिम्मेदार है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि क्षेत्रीय सहयोग के लिए सद्भावना की आवश्यकता होती है।

ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रैटेजिक स्टडीज प्रोग्राम की नेबरहुड स्टडीज पहल के एसोसिएट फेलो आदित्य गौदारा शिवमूर्ति ने कहा कि इस समूह को पुनर्जीवित करने में भारत की अनिच्छा "काफी साफ" थी। उन्होंने कहा ‘द्विपक्षीय संबंधों की प्रकृति और पाकिस्तान को अलग-थलग करने की भारत की नीतियों को देखते हुए आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते।’