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इस्लामाबाद: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हो रहे प्रदर्शनों ने दुनिया का ध्यान खींचा है। पीओके में लग रहे आजादी के नारों से बौखलाए पाकिस्तानी नेता कश्मीरियों को अहसानफरामोश और गद्दार करार दे रहे हैं। पाकिस्तानी सरकार और सेना के लिए पीओके अकेला फ्रंट नहीं है, जो उसके खिलाफ खुला हुआ है। बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वां (केपी) में भी पाकिस्तानी आर्मी और सरकार के सामने कई गुट लड़ रहे हैं। पाकिस्तान फिलहाल अपनी जमीन पर ही तीन फ्रंट पर लड़ रहा है और तीनों पर उसके लिए चीजें मुश्किल होती जा रही हैं। दिलचस्प बात यह है कि पाकिस्तानी आर्मी भारत को बांग्लादेश और चीन के साथ मिलकर थ्री फ्रंट पर घेरने की कोशिश करती रही है लेकिन वह खुद घर में ही तीन फ्रंट पर घिर गई है।

इंडिया टुडे के मुताबिक, पाकिस्तान के सामने खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस गुट ने लगातार पाकिस्तानी आर्मी को निशाना बनाया है। बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने पाकिस्तानी सरकार और सेना के खिलाफ खुले जंग का ऐलान कर रखा है। वहीं पीओके में जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी की अगुवाई में हजारों लोग सड़कों पर है। ये संघर्ष अलग-अलग समय पर और अलग-अलग वजहों से शुरू हुए लेकिन अब एक साथ चल रहे हैं और इस्लामाबाद-रालवपिंडी की चुनौती बढ़ा रहे हैं।

खैबर पख्तूनख्वा: TTP की वापसी

पाकिस्तान के तीन मोर्चों वाले आंतरिक सुरक्षा संकट में खैबर पख्तूनख्वा पहला बड़ा मोड़ साबित हुआ। अफगानिस्तान में 2021 में तालिबान के सत्ता में लौटने के बाद यहां संघर्ष की घटनाओं में साल-दर-साल 126% की बढ़ोतरी हुई (140 से बढ़कर 316)। 2020 से जुलाई 2026 के बीच इस प्रांत में 5,180 घटनाएं और 8,809 मौतें दर्ज की गईं, जो पाकिस्तान के तीनों संघर्ष वाले इलाकों में सबसे ज्यादा है।

कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस ने बताया है कि TTP के सशस्त्र संघर्ष का मकसद पाकिस्तान में शरिया व्यवस्था स्थापित करना है। काबुल में तालिबान की वापसी ने इसके हमलों के सिलसिले को तेज कर दिया। ACLED ने पाया कि TTP की 2021 में अफगानिस्तान में उसी विचारधारा वाले संगठन अफगान तालिबान की वापसी के साथ हुई और उसे इसका फायदा भी मिला। 2025 में ऐसी घटनाओं की संख्या बढ़कर 1,497 पहुंच गई।

बलूचिस्तान: सबसे लंबा विद्रोह

पाकिस्तान के तीन मोर्चों वाले आंतरिक सुरक्षा संकट में बलूचिस्तान दूसरा बड़ा अहम संघर्ष है। यहां कई दशकों से संघर्ष चल रहा है। 2022 से यहां संघर्ष की घटनाओं में साल-दर-साल 140% की बढ़ोतरी हुई (361 से बढ़कर 867 हो गईं) है। बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के संगठित और आधुनिक तरीके से काम करने से ये हुआ। 2020 से 30 जुलाई 2026 के बीच इस प्रांत में संघर्ष की 7,425 घटनाएं हुईं और 7,880 मौतें दर्ज की गईं।BLA अपने विद्रोह को बलूचिस्तान के विशाल प्राकृतिक संसाधनों पर इस्लामाबाद के कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध के तौर पर पेश करती है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) ने इन शिकायतों को और बढ़ा दिया है। इस समूह ने बार-बार चीनी नागरिकों, बुनियादी ढांचे और ग्वादर बंदरगाह परियोजना को निशाना बनाया है। जर्नल ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स का कहना है कि लोगों का ज़बरदस्ती गायब किया जाना और बिना कानूनी प्रक्रिया के हत्याओं ने स्थानीय समुदायों की नाराजगी और बढ़ाई है।

पाकिस्तान का नया फ्रंट-पीओके

खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के उलट पाकिस्तान के कब्जे कश्मीर में कोई सशस्त्र विद्रोह नहीं हो रहा है। यहां जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में लंबे समय से नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन चल रहा है। इसके बावजूद यहां बड़े पैमाने पर मौतें हो रही हैं। 2025 में मरने वालों की संख्या में साल-दर-साल 1,100% की बढ़ोतरी हुई, जबकि 2026 में 30 जुलाई तक 45 घटनाएं हुईं और 199 लोगों की मौत की खबर मिली।

पीओके में अशांति 2023 में बिजली की बढ़ती दरों और आटे की कीमतों को लेकर शुरू हुई और 2024 के मुजफ़्फराबाद मार्च के दौरान और बढ़ गई। इस दौरान हिंसा जारी रही, जिससे मरने वालों की संख्या 2024 में पांच से बढ़कर 2025 में 60 हो गई और 2026 में अब तक 199 लोग मारे जा चुके हैं। हालिया दिनों में तो पीओके में हिंसा की घटनाएं काफी ज्यादा हुई हैं और आम लोगों का गुस्सा लगातार भड़कता जा रहा है।

पाकिस्तान का रुख

पाकिस्तान के दोनों अहम बॉर्डर यानी भारत और अफगानिस्तान सीमा पर तनाव है। वहीं घरेलू मोर्चों पर भी उसके सामने तीन फ्रंट खुले हुए हैं। इसके बावजूद इस्लामाबाद और रावलपिंडी का रवैया काफी अजीब रहा है। पाकिस्तानी सेना और सरकार ने केपी, बलूचिस्तान से लेकर पीओके तक की सभी गड़बड़ियों का ठीकरा या तो भारत या फिर अफगानिस्तान पर फोड़ा है।