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नई दिल्ली: देश भर की सड़कों पर लगने वाले लंबे ट्रैफिक जाम का संबंध लोगों के काम पर जाने के तरीके से हो सकता है। भारत सरकार की केंद्रीय नोडल एजेंसी नेशनल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस ( NSO ) के पहले ‘नेशनल हाउसहोल्ड ट्रैवल सर्वे’ (NHTS) के अनुसार, सिर्फ 15% कर्मचारी ही बस, ट्रेन, ट्राम या ऑटो-रिक्शा जैसे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करते हैं, जबकि 46% लोग टू-व्हीलर या कार पर निर्भर हैं। पूरे देश में कर्मचारियों के आने-जाने में टू-व्हीलर की हिस्सेदारी 43% और कार की 3% है।

शहरी इलाकों का हाल

शहरी इलाकों में इन गाड़ियों पर निर्भरता ज्यादा है; वहां 53% कर्मचारी टू-व्हीलर और 5.7% कार का इस्तेमाल करते हैं। यानी कहें तो शहर में भी कार से बहुत कम लोग दफ्तर जा रहे हैं जबकि अधिकांश कर्मचारियों का सहारा टू-व्हीलर है।

28.3 फीसदी लोग पैदल जाते हैं दफ्तर

NSO के अनुसार, 28.3% लोग पैदल काम पर जाते हैं। देश में काम पर जाने के लिए पैदल चलना दूसरा सबसे आम तरीका है; 28.3% कर्मचारी पैदल जाते हैं, जबकि 10.7% साइकिल का इस्तेमाल करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में एक-तिहाई से ज्यादा (36%) कर्मचारी पैदल काम पर जाते हैं, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा सिर्फ 14% है।

यह सर्वे जुलाई 2025 और जून 2026 के बीच किया गया था और इसमें 1 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी वाली यात्राओं को शामिल किया गया था। सर्वे में आने-जाने को दो अलग-अलग यात्राएं माना गया है। सर्वे से पता चला कि एक कर्मचारी को काम की जगह तक पहुंचने में औसतन 25 मिनट लगते हैं।

शहरी में 27 मिनट तो ग्रामीण में 23 मिनट लगता है

शहरी इलाकों में आने-जाने में 27 मिनट लगते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में 23 मिनट लगते हैं। सुबह काम पर जाने वालों की संख्या सुबह 10 बजे से पहले सबसे ज्यादा होती है; लगभग 95% कर्मचारी उस समय काम के लिए घर से निकलते हैं।

ऑफिस आने-जाने में कितना खर्च

खर्च की बात करें तो, कामगार आने-जाने पर हर महीने औसतन ₹785 खर्च करते हैं, जिसमें पुरुष महिलाओं (₹533) की तुलना में काफी ज्यादा (₹835) खर्च करते हैं। ग्रामीण इलाकों में यह अंतर और भी बढ़ जाता है, जहां पुरुष महिलाओं के मुकाबले दोगुने से भी ज्यादा खर्च करते हैं ₹307 के मुकाबले ₹674।