नई दिल्ली: यह कहानी एम. चन्नाकेशव की है। वह कर्नाटक के तुमकुरु जिले के मास्नापुरा गांव के रहने वाले हैं। 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद 2003 में वह अपने पिता के पारंपरिक नारियल और सुपारी के फार्म से जुड़ गए। लेकिन, उन्होंने कभी लकीर का फकीर बनना स्वीकार नहीं किया। सोशल मीडिया, सरकारी प्रशिक्षण और अपने प्रयोगों के जरिए चन्नाकेशव ने मिक्स्ड फार्मिंग और ऑर्गेनिक खेती के गुर सीखे। आज वह अपनी 8 एकड़ जमीन पर नारियल और सुपारी के साथ ड्रैगन फ्रूट, रामबुतान, कॉफी, कोको और कई दुर्लभ मसालों समेत लगभग 3,000 पेड़-पौधे उगा रहे हैं। इससे उनका सालाना टर्नओवर 20-25 लाख रुपये तक पहुंच गया है। आइए, यहां एम. चन्नाकेशव की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।
पारंपरिक ढर्रे को नहीं किया स्वीकार
1983 में जन्मे चन्नाकेशव को खेती का हुनर अपने पिता से विरासत में मिला। उनके पिता 8 एकड़ जमीन पर मुख्य रूप से नारियल और सुपारी उगाते थे। 2003 में 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद चन्नाकेशव ने पिता का हाथ बंटाना शुरू किया। हालांकि, पारंपरिक खेती के ढर्रे पर चलने के बजाय उन्होंने जमीन के हर हिस्से का बेहतर इस्तेमाल करने की सोची। साल 2004-05 के दौरान उन्होंने कृषि विभाग से दो साल ट्रेनिंग ली। वहां वर्मीकंपोस्ट, जीवामृत, मल्चिंग और ग्राफ्टिंग के बुनियादी गुर सीखे। बाद में अन्य जैविक फार्मों का दौरा करके और इंटरनेट पर सोशल मीडिया पोस्ट देखकर उन्होंने अपने ज्ञान को और निखारा।
ऐसे बढ़ाया खेती का दायरा
साल 2010 से खेत की पूरी देखरेख संभालने के बाद चन्नाकेशव ने देखा कि नारियल के 350 और सुपारी के 1,000 पेड़ों के बीच काफी जगह खाली पड़ी है। 2011 में उन्होंने इस खाली जगह में काली मिर्च, इलायची और कॉफी के पौधे लगाए। साथ ही आम, कटहल और शरीफा के पेड़ भी रोपे। जब 2015 के आसपास इन फलों को बाजार में अच्छा रेस्पॉन्स और बेहतर दाम मिलने लगे तो उन्होंने विदेशी फलों की ओर रुख किया। उन्होंने केरल और मंगलुरु की नर्सरियों से रामबुतान, लोंगन, मैंगोस्टीन, पैशन फ्रूट और वॉटर एप्पल जैसी किस्मों को लाकर अपने खेत में लगाया। सोशल मीडिया के जरिए ग्राफ्टिंग तकनीक सीखकर खुद भी इनकी पौध तैयार करने लगे।
प्राकृतिक संसाधनों का किया इस्तेमाल
चन्नाकेशव ने अपने खेत को पूरी तरह ऑर्गेनिक बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का सहारा लिया। वह अपने फार्म में हल्लीकर नस्ल की देसी गायों के गोबर और मूत्र से पंचगव्य, अग्निअस्त्र, हरी खाद और जीवामृत तैयार करते हैं। हर महीने वह फसलों को जीवामृत देते हैं। गिरे हुए सूखे पत्तों से मल्चिंग करते हैं। इससे मिट्टी में नमी बनी रहती है। साथ ही पानी की खपत कम होती है। उनके खेत में लगा विशाल वर्मीकंपोस्ट बेड हर तीन महीने में 1 टन खाद बनाता है। इसके अलावा उन्होंने मधुमक्खी पालन भी शुरू किया है। आज उनके 8 एकड़ के खेत में नारियल, सुपारी, 1,000 फलदार पेड़ और मसालों को मिलाकर लगभग 3,000 पौधे लहलहा रहे हैं।
आज हो रही है जोरदार कमाई
चन्नाकेशव बिचौलियों के बिना अपनी उपज सीधे अपने खेत से ही ग्राहकों को बेचते हैं। उनके खेत पर हर हफ्ते करीब 150 से 200 ग्राहक फल और ऑर्गेनिक प्रोडक्ट खरीदने आते हैं। इससे उनका सारा स्टॉक तुरंत बिक जाता है। खेती से सालाना 20-25 लाख रुपये का टर्नओवर हासिल करने वाले चन्नाकेशव साथ में इलेक्ट्रॉनिक्स की एक छोटी दुकान भी चलाते हैं। आसपास इंडस्ट्रियल एरिया बनने से जमीन के दाम 1 करोड़ रुपये प्रति एकड़ से ऊपर चले गए हैं। इसलिए वह अपनी मौजूदा जमीन को ही बेहद कीमती मानकर उसकी सुरक्षा और संरक्षण करते हैं। आज उनका यह फार्म अन्य किसानों के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर बन चुका है। वहां लोग आकर मिक्स्ड और ऑर्गेनिक फार्मिंग की तकनीक सीखते हैं।



