पेरिस: फ्रांस में खराब शिक्षा व्यवस्था, शिक्षकों की कमी और स्कूलों के लिए अधिक फंड की मांग को लेकर छात्र कई हफ्ते से सड़कों पर हैं। देशभर में बड़े पैमाने पर छात्रों के प्रदर्शन चल रहे हैं, जिसमें कई जगह हिंसा और पुलिस से टकराव देखा गया है। इन प्रदर्शनों को लेकर दावा किया गया है कि ये प्रदर्शन विदेशी फंडिंग और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए बढ़ाए जा रहे हैं। इसमें वामपंथी और इस्लामी नेटवर्क काम कर रहा है और कथित तौर पर फ्रांस के बाद भारत अगला निशाना हो सकता है। अमेरिकी पत्रकार ने इसको लेकर भारत को चेताया है।
अमेरिका के फॉक्स न्यूज का दावा है कि कम्युनिस्ट और समाजवादी संगठनों का एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क फ्रांस में छात्रों के उग्र विरोध प्रदर्शनों का इस्तेमाल बड़े राजनीतिक और वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए कर रहा है। वे उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो पिछले दशक में अमेरिका में अशांति फैलाने, मतभेद बढ़ाने और अराजकता की छवि पेश करने के लिए अपनाए गए थे। इनके साथ इस्लामी नेटवर्क भी शामिल है।
बड़े नेटवर्क को फंडिंग
रिपोर्ट दावा करती है कि फ्रांस से लेकर अमेरिका, यूके, ब्राजील, ग्रीस और भारत तक अमीर लोग फ्रांस में स्कूलों के विरोध-प्रदर्शनों का फायदा उठा रहे हैं। वे शिक्षा से जुड़े घरेलू विवाद को बड़े राजनीतिक और वैचारिक टकराव का मंच बना रहे हैं। इसके लिए अमेरिका में कम्युनिस्ट और वामपंथी समूहों के नेटवर्क को फंड दिया जा रहा है, जो लोगों की शिकायतों का फायदा उठाकर सड़कों पर अशांति फैला रहे हैं।
फॉक्स न्यूज डिजिटल की जांच से पता चलता है कि जिस आंदोलन को स्कूलों की खराब हालत के खिलाफ छात्रों का विरोध बताया जा रहा है, वह असल में यूनियनों, कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं, अति-वामपंथी दलों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों के एक बड़े नेटवर्क का हिस्सा है। ये संगठन प्रदर्शन आयोजित कर रहे हैं, हड़तालें बुला रहे हैं, समर्थकों को एकजुट कर रहे हैं और दुनिया में अशांति की खबर फैला रहे हैं।
प्रदर्शनों के पीछे कौन-कौन?
फॉक्स न्यूज डिजिटल ने फ्रांस के छात्र विरोध आंदोलन और उसके व्यापक समर्थक नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रचार करने वालों में 50 संगठनों की पहचान की है। इससे पता चलता है कि प्रदर्शन शुरू करने वाले छात्रों के अलावा कार्यकर्ताओं का बड़ा इकोसिस्टम इसमें शामिल है। 50 समूहों के इस नेटवर्क में से 15 छात्र या युवा समूह हैं, जिनमें कई कम्युनिस्ट युवा आंदोलन और एक मुस्लिम छात्र संघ शामिल हैं।
बाकी 35 वयस्क समूहों में एक दर्जन लेबर यूनियन, आठ कम्युनिस्ट या समाजवादी संगठन, पर्यावरण सक्रियता, आर्थिक न्याय, अंतरराष्ट्रीय मीडिया और प्रवासी समुदायों को संगठित करने जैसे मुद्दों पर काम करने वाले पांच नागरिक-अधिकार या मानवाधिकार समूह, चार राजनीतिक दल और एक फिलिस्तीनी समर्थक समूह शामिल है, जो वामपंथियों और मुसलमानों के बीच रेड-ग्रीन गठबंधन को पूरा करता है।
फ्रांस से भारत का रुख
ब्रेकथ्रू न्यूज ने अपने फ्रांस कवरेज में ग्रीक कम्युनिस्ट संगठन का जिक्र करते हुए कहा कि यह घटनाक्रम आगे और भी स्टूडेंट्स के संघर्षों का संकेत है। एक और इंटरनेशनल कनेक्शन इंडियन अलायंस पेरिस से जुड़ा है, जो स्टूडेंट, रिसर्चर्स और प्रोफेशनल्स का एक छोटा फ्रांस-बेस्ड संगठन है। यह खुद को डेमोक्रेटिक और इक्वालिटेरियन भारत के लिए कमिटेड बताते हैं।
इंडियन अलायंस पेरिस ने इंडिया में स्टूडेंट डेमोंस्ट्रेशन के साथ तुलना करते हुए फ्रेंच स्टूडेंट आंदोलन को प्रमोट किया। यह खुद को मजबूत करने वाला चक्र है। कट्टर लेफ्ट एक्टिविस्ट नेटवर्क दुनियाभर में विरोध प्रदर्शनों को बढ़ाते हैं, फिर अशांति को बढ़ती ग्लोबल बगावत के सबूत के तौर पर दिखाते हैं। यानी आने वाले समय में वह भारत की ओर रुख कर सकते हैं।



