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पूनम पाण्डे, नई दिल्ली: ममता बनर्जी ने बरसों तक बंगाल की राजनीति को केंद्र में रखकर दिल्ली की सत्ता को चुनौती दी। अब बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद वह एक बार फिर विपक्ष की राजनीति के केंद्र में सक्रिय दिखाई दे रही हैं। पहले भी वह इस भूमिका को निभा चुकी हैं। उनके सामने एक तरफ अपनी पार्टी और राजनीतिक जमीन को दोबारा मजबूत करने की चुनौती है, दूसरी तरफ राष्ट्रीय विपक्ष में अपनी भूमिका तय करने का मौका।

विपक्ष में बढ़ती नजदीकियां

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट की खींचतान अपनी जगह है, लेकिन दिल्ली में दोनों फिर साथ दिख रहे हैं। सीपीएम महासचिव एमए बेबी ने चुनाव आयोग और SIR के मसले पर ममता को पत्र लिखा। ममता ने इसका सकारात्मक जवाब दिया और फोन पर बात भी की। ममता ने कहा कि जब संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों का सवाल हो तो पार्टियों को अपने राजनीतिक रंग व हितों से ऊपर उठकर मुद्दे को देखना चाहिए। इसे सिर्फ एक बयान के तौर पर देखना शायद काफी नहीं होगा। यह ममता की मौजूदा राजनीतिक जरूरत भी है और राष्ट्रीय भूमिका में आगे बढ़ने की एक कुंजी भी।

I.N.D.I.A. में भूमिका

ममता पहले भी विपक्षी एकता की बैठकों और राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक प्रयासों का हिस्सा रही हैं। लेकिन, बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद परिस्थिति बदल गई है। अब उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत राज्य सरकार नहीं है।

इसलिए विपक्ष के भीतर उनकी भूमिका इस बात से तय होगी कि वह अलग-अलग दलों के बीच संवाद और समन्वय में कितना योगदान दे पाती हैं। पिछले महीने I.N.D.I.A. गठबंधन की बैठक में भी ममता ने अलायंस का दायरा बढ़ाने की बात रखी।

उन्होंने उन दलों से संपर्क की जरूरत बताई, जो अभी इंडिया ब्लॉक का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन BJP के खिलाफ हैं। डीएमके पर विपक्ष की नजर भी है और BJP की भी। बीजेडी और आम आदमी पार्टी को भी इंडिया ब्लॉक के साथ लाने में ममता अहम भूमिका निभा सकती हैं।

नेतृत्व पर नरमी

इंडिया ब्लॉक की राजनीति की सबसे बड़ी मुश्किल यही रही है कि इसमें कई ऐसे दल हैं, जो राष्ट्रीय स्तर पर BJP के खिलाफ साथ आना चाहते हैं, लेकिन अपने-अपने राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। ममता ने कहा है कि अलग-अलग राज्यों में सहयोगी दलों की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां और मजबूरियां होती हैं।

इसके बावजूद राष्ट्रीय मुद्दों पर साथ काम किया जा सकता है। यहीं ममता की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। वह उन दलों के बीच संवाद की भूमिका निभा सकती हैं जो कांग्रेस के साथ भी हैं, लेकिन उससे कुछ दूरी भी बनाए रखना चाहते हैं। यानी ममता विपक्ष की राजनीति में एक ‘ब्रिज’ बन सकती हैं।

ममता नेतृत्व तय करने की प्रक्रिया को सामूहिक रखने की बात कर रही हैं। फिलहाल नेतृत्व की दावेदारी से दूर रहना उनकी राजनीतिक जरूरत भी है। हालांकि, राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता बढ़ाने के साथ वह बंगाल को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। तृणमूल कांग्रेस को राज्य में अपने संगठन, राजनीतिक आधार और भविष्य की रणनीति को फिर से खड़ा करना होगा।