नई दिल्ली: इंतजार करिए और उत्तर प्रदेश का चुनाव खत्म होने दीजिए, आपको अपने सभी सवालों के जवाब मिल जाएंगे। ये शब्द थे कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया के। अगस्त 2001 के आखिर में संसद को संबोधित करते हुए, उन्होंने ये बात कही थी। तब वो लोकसभा में कांग्रेस के डिप्टी लीडर थे। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली NDA सरकार तब अनिश्चितता में थी, लेकिन कांग्रेस के पास भी जरूरी संख्या बल नहीं था। जब संधिया से पूछा गया कि आगे क्या होगा तो उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से कहा कि यकीन मानिए, हालात बदलेंगे।
माना जाता था भावी प्रधानमंत्री
हालात बदले जरूर, लेकिन वैसे नहीं जैसा गुना के सांसद माधव राव सिंधिया ने सोचा था। कुछ हफ्ते बाद 30 सितंबर 2001 को 56 साल की उम्र में एक प्लेन क्रैश में माधवराव सिंधिया की मौत हो गई। इस मौत के साथ ही ग्वालियर के शाही परिवार के इस सदस्य का राजनीतिक सफर खत्म हो गया। उन्हें कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद राष्ट्रीय चेहरों में से एक और राजनीतिक हलकों में भावी प्रधानमंत्री के तौर पर देखा जाता था। एक्सपर्ट्स का मानना है कि 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की जीत के बाद सोनिया गांधी के वफादार सिंधिया प्रधानमंत्री बन गए होते। सरदार वल्लभभाई पटेल और प्रणब मुखर्जी की तरह माधवराव सिंधिया संभवतः भारत के अब तक के सबसे अच्छे प्रधानमंत्रियों हो सकते थे।
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में की पढ़ाई
डिप्लोमैट से राजनेता बने के. नटवर सिंह ने 2020 में मीडिया को बताया था कि अगर माधवराव सिंधिया जिंदा होते तो वे प्रधानमंत्री बनते। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ग्वालियर के पूर्व महाराजा कांग्रेस के शीर्ष नेता बनने के कितने करीब थे? माधवराव सिंधिया का जन्म 26 मार्च 1945 को ग्वालियर के पूर्व शाही परिवार में हुआ था। उन्होंने ग्वालियर के सिंधिया स्कूल और बाद में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की। शाही जीवन की सुख-सुविधाओं के बीच पले-बढ़े होने के बावजूद उन्होंने बहुत कम उम्र में ही चुनावी राजनीति में कदम रख लिया।
भाग्य ने रोका उत्थान
कभी नहीं हारे लोकसभा का चुनाव
सिंधिया परिवार के इस सदस्य (माधव राव) ने 1971 में 26 साल की उम्र में ग्वालियर से अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता। वे 9 बार सांसद रहे और 1971 में संसद में आने के बाद कभी कोई लोकसभा चुनाव नहीं हारे। सिंधिया का राजनीतिक सफर आसान नहीं था। 1971 में उन्होंने भारतीय जनसंघ के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा। जनसंघ वही पार्टी थी, जिसे उनका परिवार पारंपरिक रूप से समर्थन देता रहा था। 1977 में, ग्वालियर के पूर्व महाराजा ने परिवार के सदस्यों के विरोध के बावजूद कांग्रेस का दामन थाम लिया और उन्होंने फिर से ग्वालियर सीट जीती।
1984 में आखिरी समय मिला था टिकट
माधव राव सिंधिया मां विजयाराजे सिंधिया भारतीय जनसंघ और बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) से जुड़ी दिग्गज शख्सियत थीं। सिंधिया परिवार के राजनीतिक मतभेद ग्वालियर की राजनीतिक चर्चाओं का हिस्सा भी बने थे। 1984 के लोकसभा चुनाव के एक वाकये का काफी जिक्र होता है, जब माधव राव सिंधिया को कांग्रेस ने आखिरी समय पर ग्वालियर से BJP के अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया था।
वाजपेयी को 1.75 लाख वोटों से हराया
जब माधव राव सिंधिया और अटल बिहारी वाजपेयी दोनों चुनावी मैदान में आमने-सामने थे, तब विजयाराजे सिंधिया से पूछा गया कि वह किसका समर्थन करेंगी सिंधिया या वाजपेयी। इस सवाल पर विजयाराजे ने दोनों हाथ उठाकर कहा था कि दोनों मेरे बेटे हैं। विजयाराजे के इशारे की व्याख्या स्थानीय रूप से कांग्रेस के प्रतीक के संदर्भ के रूप में की गई थी और सिंधिया ने वाजपेयी को लगभग 1.75 लाख वोटों से हरा दिया था।



