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इस्लामाबाद/नई दिल्ली: हेग स्थिति मध्यस्थता न्यायालय (CoA) ने 31 अगस्त को सिंधु जल संधि (IWT) पर पाकिस्तान के पक्ष में फैसला सुनाया था। उसने कहा था कि सिंधु जल संधि ‘पूरी तरह से लागू’ है। लेकिन भारत ने हेग कोर्ट के वैधता पर सवाल खड़े करते हुए उसके फैसले को ठुकरा दिया। भारत अपने रूख पर अडिग है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पर आतंकवाद पर लगाम नहीं लगाया भारत सिंधु जल संधि को बहाल नहीं करेगा। भारत ने पिछले साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि को सस्पेंड कर दिया था।

इसको लेकर हेग न्यायालय ने अनुच्छेद XII (4) की व्याख्या करते हुए कहा कि यह संधि तब तक बनी रहेगी जब तक कि दोनों सरकारों के बीच कोई विधिवत अनुमोदित समझौता इसे समाप्त न कर दे। इसके अलावा उसने कहा कि संधि में एकतरफा तौर पर इसे स्थगित या निलंबित करने का कोई प्रावधान नहीं है। न्यायालय ने चिनाब नदी पर स्थित 850 मेगावाट की ‘रन-ऑफ-द-रिवर’ रतले जलविद्युत परियोजना को भी रोकने को कहा। भारत ने कोर्ट को हर फैसले को सिरे से खारिज कर दिया।

इसीलिए पाकिस्तान के हाथ इस ‘कथित’ जीत के बाद भी खाली हैं। पाकिस्तानी नेता पहले ही जंग और परमाणु युद्ध कि धमकियां दे चुके हैं। इस बीच पिछले हफ्ते सिंधु जल पर पाकिस्तान में बनी कमेटी ने कहा है कि इस साल देश में सिंचाईं की पानी में 22 प्रतिशत की कमी होगी। हालांकि इसके लिए कमेटी ने पाकिस्तान की सरकारों को ही जल प्रबंधन में नाकाम रहने के लिए जिम्मेदार ठहराया है।

पाकिस्तान के पास क्या-क्या विकल्प हैं?

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दबाव बढ़ाना- हेग कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विश्व बैंक और वैश्विक मंचों पर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश करेगा ताकि भारत संधि की शर्तों का पालन करे। हालांकि ऐसा करने की उसने काफी कोशिशें की है लेकिन अभी तक उसे सार्वजनिक तौर पर किसी भी देश का साथ नहीं मिला है।

तकनीकी समीक्षा की मांग- हेग अदालत द्वारा रतले परियोजना पर लगाई गई अंतरिम शर्तों को हथियार बनाकरपाकिस्तान चिनाब और झेलम नदियोंपर बन रही अन्य भारतीय रन-ऑफ-द-रिवर परियोजनाओं की डिजाइन और क्षमता की दोबारा समीक्षा की मांग कर सकता है।

द्विपक्षीय बातचीत की कोशिश- भारत के सख्त रूख को देखते हुए पाकिस्तान फिर से औपचारिक द्विपक्षीय बातचीत शुरू करने के लिए आमंत्रित कर सकता है क्योंकि अदालत ने साफ किया है कि संधि को सिर्फ आपसी सहमति से ही बदला या समाप्त किया जा सकता है। लेकिन दिक्कत ये है कि भारत बातचीत के मेज पर तभी आएगा जब पाकिस्तान आतंकवाद रोकने पर सहमति जताए।

भारत के पास क्या विकल्प हैं और क्या हो सकता है अगला कदम?

अदालत के अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह खारिज किया- भारत शुरुआत से ही द हेग स्थित मध्यस्थता अदालतकी कार्यवाही और उसकी वैधता का बहिष्कार करता रहा है। भारत का रुख रहा है कि निष्पक्ष विशेषज्ञ की प्रक्रिया ही सही मंच है। भारत इस फैसले को ‘गैर-कानूनी’ या ‘बिना अधिकार क्षेत्र वाला’ घोषित कर इसे मानने से इनकार कर चुका है। भारत आगे भी अपने इसी कदम पर कायम रहेगा।

संधि में संशोधन की मांग पर कायम रहना- भारत ने जब अप्रैल 2025 में संधि को ‘स्थगित’ किया था तो उसका मुख्य उद्देश्य 1960 के नियमों में संशोधन करना था। भारत पाकिस्तान को अल्टीमेटम दे सकता है कि यदि पाकिस्तान संधि में बदलाव जैसे- आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन के नए सुरक्षा मापदंड पर चर्चा नहीं करता, तो भारत परियोजना के निर्माण कार्य जारी रखेगा।

जमीनी स्तर पर परियोजनाओं पर तेजी से काम- कूटनीतिक इनकार के साथ-साथ भारत रतले और किशनगंगा जैसी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण में तेजी ला सकता है। भारत का यह मानना है कि उसकी परियोजनाएं संधि के तकनीकी ढांचे के भीतर ही हैं।