वॉशिंगटन/नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत इस महीने के आखिर में अमेरिका की यात्रा पर जाने वाले हैं। यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है। इस यात्रा में भारतीय मूल के लोगों और हिंदू अमेरिकी समुदाय पर खास तौर पर ध्यान दिया जाएगा। इस कार्यक्रम का सबसे खास बिंदू 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में होने वाला ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ कार्यक्रम है जहां मोहन भागवत भारतीय अमेरिकियों को संबोधित करेंगे।
यह कार्यक्रम ‘अमेरिकन हिंदूज़ फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग’ (AHEAD) की तरफ से आयोजित किया जा रहा है जिसमें 5 हजार से ज्यादा लोग शामिल हो रह हैं। बहुत साफ नजर से देखा जाए तो मोहन भागवत के ग्लोबल आउटरीच का मुख्य मकसद प्रवासी भारतीयों से सीधा संवाद साधना, सनातन धर्म के वैश्विक मूल्यों का प्रसार करना और संगठन को लेकर दुनिया में जो गलतफहमियां फैली हैं उन्हें दूर करना है।
अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा क्यों जा रहे हैं मोहन भागवत?
मोहन भागवत के इस प्रोग्राम की भाषा भारत में RSS से जुड़ी आम राजनीतिक-सामाजिक-सांस्कृतिक शब्दावली से काफी अलग है। RSS के बयान में अनेकता में एकता, नागरिक भागीदारी, अलग-अलग धर्मों के बीच आपसी समझ, वैश्विक सद्भाव, आपसी सम्मान, साझा जिम्मेदारी और सेवा पर जोर दिया गया है। और इस सोच के केंद्र में है ‘वसुधैव कुटुंबकम’ को रखा गया है।एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह सिर्फ शब्दों का बदलाव नहीं है बल्कि यह इस बात का संकेत हो सकता है कि RSS अपने सभ्यता से जुड़े संदेश को भारत से बाहर कैसे पहुंचाना चाहता है इसमें एक बड़ा बदलाव किया जा रहा है।
न्यूज 18 से बात करते हुए लेखक और RSS विचारक रतन शारदा ने कहा ‘यह कार्यक्रम मुख्य रूप से उन लोगों के लिए है जो हिंदुत्व, हिंदू दर्शन या RSS से जुड़े नहीं हैं। उनके लिए हिंदुत्व से सहमत होना जरूरी नहीं है। एकता के विचार को एक सार्वभौमिक बात के तौर पर पेश किया जा रहा है कि हम सब आपस में जुड़े हुए हैं और विविधता का मतलब बंटवारा नहीं है।’
संघ के प्रति गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश
उन्होंने कहा ‘पश्चिमी देशों के बड़े हिस्से में राष्ट्रवाद शब्द का मतलब नकारात्मक हो गया है जबकि एकता सभ्यता से जुड़ा एक ऐसा विचार है जो राष्ट्रीय सीमाओं से परे जा सकता है। वसुधैव कुटुंबकम का मतलब है समानता खोजना, साथ ही यह स्वीकार करना कि लोग अलग-अलग तरीकों से खुद को व्यक्त करेंगे।’
मोहन भागवत ने हाल ही में मुंबई में कहा था कि भारत का लक्ष्य दुनिया पर प्रभुत्व जमाना नहीं बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक रूप से ‘विश्वगुरु’ बनकर दुनिया का मार्गदर्शन करना है। इस यात्रा के जरिए वह वैश्विक मंचों से वसुधैव कुटुंबकम और वैश्विक सद्भाव का संदेश देंगे।



