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भोपाल। राजधानी में बेहतर कानून व्यवस्था के दावे के साथ लागू किया गया पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम अब अपनी ही कमजोरियों से जूझता नजर आ रहा है। ढांचा तो पहले से कहीं बड़ा और मजबूत तैयार किया गया, लेकिन अफसरों की भारी कमी इस व्यवस्था का प्रभाव कम होता जा रहा है। हालात यह हैं कि जिन अफसरों की संख्या बढ़ाकर व्यवस्था को सशक्त बनाने की बात कही गई थी, उन्हीं पदों पर लंबे समय से नियुक्तियां नहीं हो पाई हैं।

पुरानी डीआईजी प्रणाली में महज 25 राजपत्रित अधिकारियों के भरोसे पूरा शहर संचालित होता था। इसके मुकाबले कमिश्नरेट सिस्टम में आईजी स्तर के नेतृत्व में 50 से अधिक राजपत्रित अफसरों के बड़े ढांचे का प्रावधान किया गया। लेकिन विडंबना यह है कि इस विस्तारित ढांचे के बावजूद करीब एक दर्जन अहम पद अब भी खाली पड़े हैं।

बिना कप्तान के संवेदनशील जोन

सबसे चिंताजनक स्थिति उन जोन की है, जहां अपराध का ग्राफ सबसे अधिक है। जोन-1, जहां शहर के सबसे ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज होते हैं, वहां डीसीपी का पद पिछले पांच महीनों से खाली है। इसी तरह पुराने शहर का जोन-3, जो कानून व्यवस्था के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है, वहां ढाई साल से स्थायी डीसीपी की नियुक्ति नहीं हो सकी है। इन दोनों जोन में लूट, हत्या और गोलीबारी जैसी गंभीर वारदातें सामने आ चुकी हैं।

प्रभार का बोझ, कमजोर मॉनिटरिंग

रिक्त पदों का अतिरिक्त प्रभार अन्य अधिकारियों को सौंपा गया है, जिससे उन पर काम का दबाव बढ़ गया है। नतीजतन थानों की नियमित मॉनिटरिंग प्रभावित हो रही है। जमीनी स्तर पर अधिकारियों की मौजूदगी कम होने से कानून व्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है।