Spread the love

एथेंस: भारत रक्षा-कूटनीति के रास्ते यूरोप में अपनी पैठ गहरी कर रहा है। भूमध्य सागर इस मामले में एक अहम टेस्ट बनकर उभरा है। साइप्रस और ग्रीस के साथ रक्षा संबंधों के विस्तार ने पाकिस्तान के दोस्त तुर्की के सामने मुश्किल खड़ी कर दी है। राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन इस इलाके में तुर्की की दादागीरी स्थापित करना चाहते हैं, लेकिन भारत की बढ़ती रक्षा मौजूदगी राह में बड़ी बाधा बन रही है। तुर्की को सबसे बड़ी टेंशन साइप्रस से हो रही है, जिसके बारे में खबर है कि वह भारत की ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइल का मूल्यांकन कर रहा है।

ये रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब भारत के रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह 12 से 15 अक्टूबर तक साइप्रस और ग्रीस के दौरे पर हैं। साइप्रस इस बात का साफ उदाहरण है कि भारत कैसे कूटनीति और रक्षा उपकरणों की बिक्री को एक साथ लाने की कोशिश कर रहा है। इस बीच साइप्रस के ब्रह्मोस की खरीद पर विचार ने सबका ध्यान खींचा है। ब्रह्मोस भारत के रक्षा निर्यात की कहानी का मुख्य हिस्सा है। नई दिल्ली के लिए यह मिसाइल सिर्फ एक हथियार बेचने से कहीं ज्यादा है।

भारत के सामने मुश्किल

भारत के लिए यह दिखाने का मौका है कि भारतीय रक्षा निर्माण संवेदनशील बाजारों में भी मुकाबला कर सकता है, जहां रणनीतिक संकेत मायने रखते हैं। हालांकि, किसी भी सौदे तक पहुंचना आसान नहीं है। इसकी कुछ खास वजहें हैं

  • यूरोपीय यूनियन के समर्थन वाली लोन व्यवस्था गैर-यूरोपीय सामग्री को 35 प्रतिशत तक सीमित करती है। इससे रूस की भागीदारी वाले संयुक्त उद्यम से बने सिस्टम के लिए नियमों का पालन करने में बाधा आती है।
  • ब्रह्मोस में रूस की 49.5 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसका मतलब है कि निर्यात के किसी भी फैसले में मॉस्को की भूमिका हो सकती है।
  • यह सीमा सैन्य बिक्री को भारत, रूस और खरीदार के बीच तीन-तरफा बातचीत में बदल देती है। यह भारत के रक्षा निर्यात की चुनौती भी सामने लाता है।
  • भारत के लिए अन्य देशों की निर्यात मंजूरी के मामले अभी सुलझे नहीं है। नई दिल्ली को अभी भी इंडोनेशिया और वियतनाम को ब्रह्मोस की सप्लाई के लिए रूस की मंजूरी का इंतजार है।

भारत की एंट्री से तुर्की चौकन्ना

भूमध्य सागर में भारत की बढ़ती रक्षा पहुंच ने तुर्की को चौकन्ना कर दिया है। तुर्की के इस पर ध्यान देने के अपने कारण हैं। साइप्रस के उत्तरी इलाके पर कब्जे ने इस इलाके में किसी भी तरह के सैन्य गठबंधन को राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना दिया है। इसके अलावा भूमध्य सागर में समुद्री सीमाओं और ऊर्जा अधिकारों को लेकर भी साइप्रस और तुर्की के बीच लंबे समय से विवाद है।

भारत के बढ़ते सुरक्षा संबंधों से तुर्की के लिए स्थिति जटिल हो जाती है। हमारे सहयोगी TOI की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के साथ तुर्की के संबंध चिंता को और बढ़ाते हैं। तुर्की पाकिस्तान का समर्थक रहा है। ऐसे में भूमध्य सागर में भारत के बढ़ते प्रभाव को अंकारा में एक रणनीतिक जवाब के रूप में देखा जा सकता है।

ग्रीस-भारत की दोस्ती से डरा तुर्की

रक्षा सचिव का अगला पड़ाव ग्रीस है। खास बात है कि तुर्की और ग्रीस भी इलाके में विरोध हैं। एथेंस और अंकारा के बीच लंबे समय से तनाव रहा है। ऐसे में साइप्रस के बाद भारत का ग्रीस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ना एक ऐसे पैटर्न का हिस्सा होगा, जिससे नजरअंदाज कर पाना तुर्की के लिए मुश्किल होगा।