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आलोक शर्मा: हाल की दो घटनाएं दर्शाती हैं कि बदलते वक्त के साथ समाज का एक वर्ग सांस्कृतिक पहचान के इर्द गिर्द बनाई गई धर्म व कट्टरपंथ की दीवारों को तोड़ना चाहता है। केरलम में ओणम के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में युवा मुस्लिम लड़कियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। वहीं, महाराष्ट्र में गरबा कार्यक्रमों में मुस्लिम युवाओं की भागीदारी का विरोध करने वालों के खिलाफ आवाज उठी। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की पत्नी अमृता भी कह चुकी हैं कि गरबा कार्यक्रमों में मुस्लिम युवाओं के शामिल होने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगना चाहिए।प्रभावशाली भूमिका । समाज के तौर पर हमें दोनों घटनाओं का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि आधुनिक दौर में उदार, प्रगतिशील और समावेशी सोच को बढ़ावा देना जरूरी है। धार्मिक संकीर्णता न राष्ट्र के हित में है, न समाज के। हालांकि, ऐसे मुद्दों पर राह आसान नहीं। बड़ी चुनौती कट्टरपंथियों की सोच को नरम करने की है।

विडियो से नाराजगी। केरलम में ओणम महज धार्मिक नहीं, सामाजिक उत्सव रहा है। ऐतिहासिक रूप से इस त्योहार में ईसाई और मुस्लिम समुदाय के लोग भी जुड़े रहे हैं। इस बार बड़ी संख्या में थत्तम पहने मुस्लिम छात्राओं ने ओणम कार्यक्रमों में नृत्य के विडियो सोशल मीडिया पर साझा कर अपनी मलयाली पहचान जताई। मुस्लिम कट्टरपंथी वर्ग को यह नागवार गुजरा। समस्त केरल जमीयतुल उलेमा जैसे संगठन ने महिलाओं की सार्वजनिक मौजूदगी पर प्रतिबंध का सर्कुलर जारी किया। मुस्लिम धर्मगुरु एपी अबूबकर ने कुरान का हवाला देते हुए महिलाओं को घर के भीतर रहने को कहा।सोच पर सवाल। केरलम की उच्च शिक्षा में मुस्लिम लड़कियों की हिस्सेदारी लड़कों से अधिक है। इसलिए मुस्लिम नेतृत्व से अपेक्षा थी कि वह छात्राओं के साथ खड़ा नजर आएगा और शिक्षा, राजनीति, रोजगार व सोशल मीडिया में उनकी मौजूदगी और समानता का समर्थन करेगा। इसके उलट, IUML ने अबूबकर के रूढ़िवादी बयान को जायज ठहराते हुए कहा कि धर्मगुरु की चिंता जायज है। विडंबना है कि यह बयान ऐसे समय आया, जब केरल चुनाव में IUML के इतिहास में पहली बार महिला विधायक फातिमा तहलिया चुनी गईं। इससे मुस्लिम समुदाय में उभरती प्रगतिशील सोच पर सवाल खड़े हुए।दायरा बड़ा। हमें यह समझना होगा कि केरलम में ओणम, गुजरात व महाराष्ट्र में नवरात्र और देश के पूर्वी-पूर्वोत्तर राज्यों में दुर्गा पूजा जैसे उत्सव महज धार्मिक आयोजन नहीं हैं। इनका कैनवास बहुत बड़ा है, जिसमें सामाजिक सहभागिता, प्रदेश या क्षेत्र की सांस्कृतिक अस्मिता से लेकर आजीविका और आर्थिक निर्भरता तक शामिल है। ये उत्सव देश की पहचान हैं और इन्हें सिर्फ धर्म के दायरे में सीमित नहीं करना चाहिए। लेकिन, दोनों तरफ के कट्टरपंथी इन उत्सवों को केवल धार्मिक नजरिये से देखते हैं और यही सोच पूरे समाज पर थोपना चाहते हैं। इससे साझा संस्कृति और सामाजिक सौहार्द प्रभावित होते हैं।बदलाव चाहिए। ऐसे समय में जब भारत के विश्व गुरु बनने का सपना देखा जा रहा है, कट्टरपंथियों को भी अपनी सोच बदलने की जरूरत है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल में पश्चिमी देशों की यात्रा के दौरान सार्वभौमिक एकता का संदेश देते हुए कहा कि मुसलमानों को भारतीय समाज से अलग करने वाला व्यक्ति सच्चा हिंदू नहीं हो सकता। महाराष्ट्र BJP के कुछ नेता अमृता फडणवीस के गरबा संबंधी बयान को भागवत की इसी सोच के संदर्भ में देखते हैं।

दीवार सही नहीं। विश्व हिंदू परिषद (VHP) से दूरी बनाते हुए महाराष्ट्र सरकार के एक मंत्री ने कहा कि गरबा-डांडिया जैसी सांस्कृतिक पहचान के आसपास धर्म या जाति की दीवारें खड़ी नहीं की जा सकतीं। लेकिन, दूसरे मंत्री नीतेश राणे VHP के समर्थन में हैं। राणे का कहना है कि नवरात्र के गरबा-डांडिया कार्यक्रम ‘लव जिहाद’ का मौका भी देते हैं। हालांकि, अमृता के बयान के बाद उनका रुख कुछ नरम हुआ। उन्होंने कहा कि अगर मुस्लिम युवा इन कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं तो उनकी नीयत ‘साफ’ होनी चाहिए।बहस का मौसम। भागवत के हालिया बयानों ने राणे जैसे BJP के कई नेताओं और समर्थकों को असहज किया है। इसकी झलक सोशल मीडिया पर भी काफी देखने को मिली। BJP में इस मुद्दे पर उभरते अंतर्विरोध के बीच इस बार शरद ऋतु में नवरात्रि और दुर्गा पूजा जैसे उत्सवों पर सबकी निगाहें रहेंगी। इन आयोजनों में धार्मिक पहचान और सामाजिक सहभागिता को लेकर होने वाली बहस अहम होगी।