नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में पिछले सात महीनों से जारी युद्ध ने अब दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक सऊदी अरब को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जिससे ग्लोबल ऑयल सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है। होर्मुज स्ट्रेट 28 फरवरी से बंद है, जबकि 10 सितंबर को ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर ड्रोन हमले के बाद सऊदी अरब के कच्चे तेल के निर्यात का पश्चिमी रास्ता भी बंद हो गया है। इन रुकावटों के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़कर 109.4 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं, अभी ये 104.2 डॉलर पर हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ‘लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट’ पर हस्ताक्षर करने के बाद सप्लाई में रुकावट और बढ़ सकती है। ट्रंप ने यूएन में कहा कि अमेरिकी कांग्रेस चुनावों के बाद ईरान के पास या तो पूरी तरह खत्म होने या फिर डील करने का विकल्प है। सात दिनों के भीतर ही ईरान ने संकेत दिया कि वह डील करना पसंद करेगा।
16-17 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक पहुंच सकता है सप्लाई संकट
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से पहले दुनिया की करीब 20 फीसदी तेल आपूर्ति इसी रास्ते से गुजरती थी। इसमें करीब 1.5 करोड़ बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और 50 लाख बैरल पेट्रोलियम उत्पाद शामिल थे। होर्मुज के रास्ते को आंशिक रूप से बायपास करने के लिए सऊदी अरब ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए करीब 40 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल निर्यात कर रहा था। वहीं, यूएई हबशन-फुजैराह पाइपलाइन के जरिए करीब 15 लाख बैरल प्रतिदिन तेल बाहर भेज रहा था। दोनों देश होर्मुज से बाहर तेल पहुंचाने के लिए शटल सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे थे, जहां उसे दूसरे जहाजों में ट्रांसफर कर आगे भेजा जा सकता था।
LNG और पेट्रोलियम उत्पादों पर भी असर
इस रुकावट का असर सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं रहेगा। इसका असर पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स और एनएनजी पर भी पड़ेगा। एलएनजी को करीब -163 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखा जाता है और समुद्र के बीच इसे आसानी से दूसरे जहाज में ट्रांसफर नहीं किया जा सकता।
अमेरिका में भी बढ़ी कीमतों की मार
ईरानी बंदरगाहों पर अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी से तेहरान पर दबाव तो बनता है, लेकिन इससे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों पर भी असर पड़ रहा है। इससे ईरान के स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगातार बंद रखने के रुख के और मजबूत होने की आशंका है।
ग्राहम एक्ट लागू करने से न सिर्फ उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को नुकसान हो सकता है जिन्हें निशाना बनाया गया है, बल्कि अमेरिकी उपभोक्ताओं को भी नुकसान हो सकता है। क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ने से अमेरिका में भी कीमतें बढ़ेंगी। अमेरिका के बेंचमार्क WTI की कीमत पहले ही 27 फरवरी को 67.02 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर अब 92.41 डॉलर हो गई है।
यमन में सऊदी समर्थित बलों को झटका
इस बीच यमन में सऊदी समर्थित बलों को भी नुकसान उठाना पड़ा है। हूतियों ने मोचा बंदरगाह पर कब्जा कर लिया है और पेरिम द्वीप पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया है। इसके अलावा सऊदी अरब के सीमावर्ती शहरों और रियाद पर भी हमले किए गए हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के सीधे सैन्य हस्तक्षेप के अनुरोध को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिका के अलावा ब्रिटेन और फ्रांस का समर्थन फिलहाल खुफिया जानकारी और लॉजिस्टिक सहायता तक सीमित बताया गया है। तुर्की और पाकिस्तान ने भी सऊदी अरब के समर्थन में कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच पिछले साल स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट हुआ था। इससे पहले 2015 में भी पाकिस्तान ने हूतियों के खिलाफ सऊदी अरब के सैन्य अभियान में सीधे हस्तक्षेप से इनकार किया था।
भारत पर क्यों बढ़ सकता है दबाव?
भारत रूसी कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन उसने यह खरीद तब की थी जब अमेरिका ने कोई प्रतिबंध नहीं लगाया था। बाइडेन प्रशासन की ‘प्राइस कैप’ (कीमत की सीमा) पॉलिसी के तहत रूसी कच्चा तेल खरीदने की इजाजत थी, लेकिन छूट के साथ। हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने भी समय-समय पर रूसी कच्चा तेल खरीदने के लिए लाइसेंस दिए थे। यह कानून भारत को तब निशाना बना रहा है जब उसने अमेरिकी तेल और गैस की खरीद बढ़ा दी है। अप्रैल-दिसंबर 2025 के दौरान, भारत ने 8.2 अरब डॉलर का रूसी कच्चा तेल आयात किया। इस साल अगस्त में अमेरिका LNG आयात का सबसे बड़ा स्रोत भी बनकर उभरा है।
कतर से लंबे समय तक होने वाली सप्लाई बंद होने के बाद से भारत की खरीद में स्पॉट LNG का हिस्सा बढ़ गया है। ऐसे में लंबे समय तक ऊंची ऊर्जा कीमतें भारत के आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर दबाव डाल सकती हैं।
राजनीतिक समाधान से ही राहत की उम्मीद
जब तक कोई राजनीतिक समाधान नहीं निकलता, तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहेंगी। अमेरिका और ईरान को 17 जून के मेमोरेंडम पर वापस लौटना होगा। अमेरिका को जोरो एनरिचमेंट (संवर्धन) पर जोर देने की जरूरत नहीं है, NPT गैर-परमाणु हथियार वाले देशों को 3.67% एनरिचमेंट की इजाजत देता है। अमेरिका द्वारा नौसैनिक नाकेबंदी और प्रतिबंध हटाने तथा ईरानी संपत्ति को अनफ्रीज करने के बदले में, ईरान को होर्मुज से आजाद आवाजाही के मामले में लचीलापन दिखाना होगा।



