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नई दिल्ली: भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर दिग्गज अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया का मानना है कि देश की आर्थिक वृद्धि आगे भी मजबूत बनी रह सकती है। पनगढ़िया नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष हैं। उनके मुताबिक, भारत की जीडीपी ग्रोथ 7-8% के आसपास रह सकती है। उन्होंने कहा कि रुपये का कमजोर होना हमेशा नुकसानदेह नहीं होता, क्योंकि इससे भारतीय सामान विदेशी उत्पादों के मुकाबले ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकता है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर पनगढ़िया ने टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारतीय कारोबारियों ने वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच काम करना सीख लिया है। उन्होंने आयात शुल्क घटाने, कई क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) हटाने और विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए द्विपक्षीय निवेश समझौतों की समीक्षा करने की भी वकालत की।

7-8% की रफ्तार से बढ़ सकती है अर्थव्यवस्था

पनगढ़िया के मुताबिक, भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत है। पिछले तीन साल में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की करीब 10% सालाना वृद्धि भविष्य के लिए अच्छा संकेत है। महंगाई स्थिर रही है और चालू खाते का घाटा भी नियंत्रण में है।

उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में तनाव के कारण लागत और लॉजिस्टिक्स से जुड़ी चुनौतियां जरूर हैं, लेकिन भारतीय कारोबारियों में विकास को लेकर घबराहट नहीं दिखती। कोरोना महामारी के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से उबरी और अमेरिकी टैरिफ के बावजूद भारत का निर्यात बढ़ा। इससे पता चलता है कि कारोबारियों ने अनिश्चित हालात से निपटना सीख लिया है।

कमजोर रुपया हमेशा नुकसान नहीं पहुंचाता

पनगढ़िया के मुताबिक, रुपये के कमजोर होने से आयात महंगा होता है, लेकिन इससे भारतीय उत्पाद भी विदेशी सामान के मुकाबले सस्ते और प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि आयातित तैयार सामान की कीमत बढ़ने से घरेलू कंपनियों को बाजार में मुकाबला करने का फायदा मिलता है। हालांकि, इससे उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले आयातित कच्चे माल और दूसरे इनपुट की लागत भी बढ़ती है। इसलिए इसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि तैयार आयातित सामान की कीमत कितनी बढ़ती है और घरेलू कंपनियों की लागत पर कितना दबाव आता है।

पनगढ़िया ने उदाहरण देते हुए कहा कि 1991 से 2002 के बीच डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब 170% की गिरावट आई थी। इसके बाद रुपये की विनिमय दर लंबे समय तक लगभग उसी स्तर के आसपास रही। उनके मुताबिक, 2011-12 में भारत का निर्यात 300 अरब डॉलर के पार पहुंचा, लेकिन बाद में इसमें गिरावट आई और कोरोना महामारी के बाद ही फिर बढ़ोतरी हुई।

आयात शुल्क घटाने की जरूरत

पनगढ़िया ने कहा कि भारत को व्यापार समझौतों के जरिए आयात शुल्क कम करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने अमेरिका के साथ व्यापार समझौता होने की भी उम्मीद जताई। उनके मुताबिक, इससे भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुंच मिलेगी और भारत के घरेलू बाजार में भी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

उन्होंने क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर (QCO) की समीक्षा करने की जरूरत बताई। साथ ही उन्होंने एंटी-डंपिंग ड्यूटी के ज्यादा इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। यह शुल्क तब लगाया जाता है, जब किसी दूसरे देश से सामान कथित तौर पर सामान्य कीमत से कम दाम पर बेचा जाता है। पनगढ़िया के मुताबिक, कई मामलों में यह शुल्क सामान्य आयात शुल्क से भी ज्यादा असर डाल सकता है।