श्रीधर वेम्बू (जोहो कॉरपोरेशन के संस्थापक और पूर्व सीईओ)
भारत की तेजी से विकसित हो रही डीप टेक क्षमता के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदृष्टि और प्रतिबद्धता का बड़ा योगदान है। आज जिन चीजों का निर्माण देश कर रहा है। 15 साल पहले उनमें से कई को अव्यावहारिक मानकर खारिज कर दिया जाता। जैसे किसी निजी भारतीय कंपनी का अंतरिक्ष में रॉकेट भेजना, देश में सेमीकंडक्टर श्रीधर वेम्बू फैक्ट्री लगाना या भारत में बनाए गए रक्षा उपकरणों को दूसरे देशों को बेचना।
विशेषज्ञता और अनुभव
हमें यह भी स्पष्ट समझना चाहिए कि आत्मनिर्भरता का मतलब क्या है। इसका मतलब यह नहीं है कि हर छोटी से छोटी चीज देश में ही बनाई जाए या दुनिया के साथ काम करना बंद कर दिया जाए। आत्मनिर्भरता का मतलब है कि हम जिन चीजों का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें खुद विकसित करने, उनकी तकनीक तैयार करने और उन्हें बेहतर बनाने की क्षमता हमारे पास हो। इससे हम दुनिया के साथ पूरे आत्मविश्वास के साथ जुड़ और काम कर सकें।
सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में यह बात और भी स्पष्ट दिखाई देती है। भारत में चिप डिजाइन करने वाले विशेषज्ञों की बड़ी संख्या है, लेकिन चिष बनाने की क्षमता अब तक एक बड़ी कमी रही है। धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की सेमीकंडक्टर फैक्ट्री इसी कमी को दूर करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। यह करीब 91,000 करोड़ रुपये की परियोजना है। इसमें हर महीने 50,000 वेफर बनाने की क्षमता विकसित की जाएगी। इनका इस्तेमाल ऑटोमोवाइल, औद्योगिक प्रणालियों, बिजली से जुड़े उपकरणों और माइक्रोकंट्रोलर जैसे क्षेत्रों में होगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स में तरक्की यहां तक पहुंचने में सरकार का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण रहा है। सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के तहत मंजूर परियोजनाओं को पूंजीगल खर्च का 50% तक वित्तीय समर्थन दिया जाता है। मई 2026 तक छह राज्यों में 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी थी, जिनमें लगभग 1.65 लाख करोड़ रुपये के निवेश की प्रतिवद्धता है। सेमीकॉन 2.0 के जरिए इस प्रयास को चिप डिजाइन, उपकरण और जरूरी सामग्री के क्षेत्र तक भी बढ़ाया जा रहा है। हम पहले ही देख चुके हैं कि औद्योगिक क्षेत्र में सीखने और क्षमता बढ़ाने का असर समय के साथ कैसे बढ़ता है।
लाख करोड़ रुपये पहुंच गया। मोबाइल फोन का उत्पादन 6.27 लाख करोड़ रुपये और उसका निर्यात 2.59 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। सिर्फ असेंबली के काम से भारत रातोंरात इलेक्ट्रॉनिक्स की बड़ी ताकत नहीं बन गया। लेकिन, इससे कारखाने बने, कामगारों का कौशल बढ़ा, गुणवत्ता की बेहतर व्यवस्था विकसित हुई और देश में इतना बड़ा बाजार तैयार हुआ कि अगली कड़ी के आपूर्तिकर्ताओं व उद्योगों को भारत आने का प्रोत्साहन मिला।
रिसर्च से विकास
कम चर्चित लेकिन एक बेहद महत्वपूर्ण विषय है-अनुसंधान संस्थान। डीप तकनीकी के क्षेत्र में लंबे समय तक ऐसा भी होता है, जब दिखाने के लिए कोई बड़ी उपलब्धि नहीं होती। किसी तकनीक को विकसित करने में कई साल लग सकते हैं और इस तरह की अनिश्चितता में निजी निवेश हमेशा एक दशक तक पैसा लगाने के लिए तैयार नहीं होता।
इसी कमी को दूर करने के लिए अनुसंधान नैशनल रिसर्च फाउंडेशन बनाया गया है। इसके लिए 2023 से 2028 के बीच 50,000 करोड़ रुपये के खर्च की योजना है। इसके अलावा। लाख करोड़ रुपये की एक अलग अनुसंधान, विकास और नवाचार योजना भी बनाई गई है। इसका उद्देश्य भविष्य में तेजी से विकसित होने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निजी कंपनियों के अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देना है।
स्पेस में उपलब्धि
जब स्काईरूट का विक्रम-1 इस साल जुलाई में श्रीहरिकोटा से अंतरिक्ष के लिए रवाना हुआ, तो यह इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि एक निजी भारतीय टीम ने प्रणोदन, सामग्री, इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों, सॉफ्टवेयर और संचालन जैसी अलग अलग तकनीकों को एक साथ जोड़कर एक जटिल रॉकेट तैयार करना सीखा। इस काम में इसरो के वर्षों से जमा ज्ञान और उपलब्ध बुनियादी ढांचे ने सीखने की प्रक्रिया को आसान बनाया। इन-स्पेस ने निजी कंपनियों को इस व्यवस्था से जोड़ने का व्यावहारिक रास्ता उपलब्ध कराया। आज भारत में सैकड़ों अंतरिक्ष स्टार्टअप है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस नई अंतरिक्ष पीढ़ी को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है।
नीतियों में निरंतरता
मुझे वह समय याद है जब भारत में हम सॉफ्टवेयर सेवाओं और सॉफ्टवेयर उत्पादों के बीच अंतर को लेकर भी संघर्ष कर रहे थे। आज वह बहस बहुत छोटी लगती है। भारत की युवा कंपनियों अच चिप, रॉकेट, ड्रोन, AI मॉडल, चिकित्सा उपकरण और उन्नत सामग्री जैसी तकनीकों पर काम कर रही है। यह एक लंबी और कलिन यात्रा है। इसलिए नीतियों में निरंतरता बेहद महत्वपूर्ण है।
सेमीकंडक्टर फैक्ट्री, रक्षा प्रणाली या शोध विश्वविद्यालय चुनावी चक्र के हिसाब से नहीं बनाए जा सकते। मोदी सरकार ने रणनीतिक तकनीक को अपनी विकास नीति के केंद्र में लगातार बनाए रखा है। इससे कंपनियों और संस्थानों को आगे बढ़कर काम करने का पर्याप्त अवसर मिला है।



