मृत्युंजय राय: क्या पश्चिमी देशों के वर्चस्व का दौर दुनिया में खत्म हो रहा है और उसकी जगह जो नई तस्वीर उभर रही है, वह कैसी है? सर विंस केबल की किताब ‘Eclipsing the West: China , India and the Forging of a New World’ के केंद्र में यही बात है। विंस केबल ब्रिटेन के पूर्व कैबिनेट मंत्री और अर्थशास्त्री रहे हैं। वह लिखते हैं कि कोई तीन सदी तक दुनिया में पश्चिमी देशों का वर्चस्व रहा, जो ढलान की राह पर है। इसकी जगह दुनिया में एशियाई देशों के नेतृत्व में बहुध्रुवीय व्यवस्था उभर रही है।
विंस केबल एशिया के बारे में अच्छी जानकारी रखते हैं। उन्होंने चीन और भारत में हो रहे बदलावों पर दशकों से नजर रखी हुई है। इस किताब में ऐतिहासिक संदर्भ, आर्थिक विश्लेषण और जियो-पॉलिटिकल पहलुओं को शामिल करते हुए बताया गया है कि 21वीं सदी का भविष्य अमेरिका या यूरोप तय नहीं करेगा बल्कि इसमें चीन और भारत की कहीं बड़ी भूमिका होगी।
इसलिए वैश्विक व्यापार, वित्त, सुरक्षा और क्लाइमेट गवर्नेस पर इनका प्रभाव बढ़ रहा है। विंस लिखते हैं कि दुनिया की एक तिहाई आबादी इन्हीं दोनों देशों में रहती है और वैश्विक जीडीपी में इनकी हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। आज कई मामलों में चीन या तो अमेरिका को टक्कर दे रहा है या उससे आगे निकल चुका है। दूसरी ओर, भारत भी इस सदी के मध्य तक दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
विंस लिखते हैं कि ये तो दोनों देशों के बीच कॉमन बातें हैं, लेकिन चीन जहां निर्यात आधारित आर्थिक मॉडल पर चल रहा है और वह भारी-भरकम निवेश करता है, वहीं भारतीय इकॉनमी की ताकत उसका सर्विसेज सेक्टर है।
वह लिखते हैं कि चीन में जहां कम्युनिस्ट पार्टी की तानाशाही है, वहीं भारत में लोकतंत्र है। विंस लिखते हैं कि शीत युद्ध के खत्म होने तक जहां वैश्विक जीडीपी में पश्चिमी देशों का योगदान करीब 60% था, वह अब घटकर 40% के करीब आ गया है।
इससे एशियाई देशों के लिए इसे भरने का मौका बन रहा है। इसमें खासतौर पर चीन कई जगहों पर अमेरिका को चुनौती देता हुआ दिख भी रहा है।



