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बेंगलुरु : कर्नाटक हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि किसी बैंक के पास आधिकारिक निर्देशों में तय सीमा से ज्यादा फंड फ्रीज करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में कहा कि जब भी फ्रीज करने के निर्देश में किसी खास रकम का जिक्र हो, तो बैंक को खाते में बची हुई रकम के इस्तेमाल की इजाजत देनी चाहिए, सिवाय तब जब निर्देश में पूरे खाते को फ्रीज करने के लिए कहा गया हो। जस्टिस सूरज गोविंदराज ने बेंगलुरु के रहने वाले मधु की याचिका को मंजूरी देते हुए यह बात कही।

प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारी मधु ने इंडसइंड बैंक की कोथानूर ब्रांच के उस कदम को चुनौती देते हुए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसमें बैंक ने उनके खाते को फ्रीज़ कर दिया था। यह कार्रवाई दो सूचनाओं के आधार पर की गई थी।

बैंक ने दी यह सफाई

मधु ने कोर्ट को बताया कि एक गुजरात के मेहसाणा की साइबर क्राइम पुलिस की ओर से 15,000 रुपये के लिए और दूसरी पश्चिम बंगाल के बैरकपुर पुलिस स्टेशन से 10,000 रुपये के लिए उसका अकाउंट फ्रीज कर दिया गया। उनके मुताबिक, इन सूचनाओं में बैंक अधिकारियों को सिर्फ 25,000 रुपये की रकम फ्रीज़ रखने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, बैंक ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि उसने भविष्य में ऐसे और निर्देशों की आशंका को देखते हुए याचिकाकर्ता का पूरा खाता फ्रीज़ कर दिया था।

बैंक से जज ने क्या कहा

जस्टिस सूरज गोविंदराज ने कहा कि इस मामले में बैंक जिस अधिकार का इस्तेमाल कर रहा है, वह कोई स्वतंत्र अधिकार नहीं है। बैंक सिर्फ़ खाते के कस्टोडियन (रखवाला) के तौर पर काम करता है और उसे सक्षम जांच एजेंसियों द्वारा कानूनी रूप से जारी निर्देशों का पालन करना होता है। इसलिए, उसे मिले निर्देशों की शर्तों के दायरे में ही उसका अधिकार सीमित होता है, जज ने आगे कहा।

जस्टिस ने लगाई जमकर क्लास

जस्टिस ने आगे कहा कि जांच एजेंसी की ओर से जारी सूचना पर कार्रवाई करते हुए बैंक एक सीमित और प्रशासनिक काम करता है। बैंक न तो जांच करने वाली अथॉरिटी है और न ही फैसला करने वाली अथॉरिटी। उसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ सक्षम अथॉरिटी द्वारा कानूनी रूप से जारी निर्देशों का ईमानदारी से पालन करने तक सीमित है। ऐसे निर्देशों को लागू करने की प्रक्रिया में, बैंक न तो खुद से ऐसे अधिकार ले सकता है जो उसे कानून से नहीं मिले हैं, और न ही अपनी धारणाओं, आशंकाओं या प्रशासनिक विचारों के आधार पर मिले निर्देशों के दायरे को बढ़ा सकता है।

हाई कोर्ट ने कहा- निर्देशों के बाहर न जाएं

बेंच ने कहा कि ग्राहक के खाते में मौजूद रकम खाताधारक की ही संपत्ति होती है, जिस पर सिर्फ़ अथॉरिटी द्वारा लगाई गई पाबंदियां लागू होती हैं। बैंक खाते के इस्तेमाल पर किसी भी तरह की पाबंदी के गंभीर सिविल नतीजे हो सकते हैं। अकाउंट फ्रीज़ होने से अकाउंट होल्डर की रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने, कॉन्ट्रैक्ट के तहत जिम्मेदारियां निभाने, बिज़नेस ट्रांज़ैक्शन करने, कानूनी देनदारियां चुकाने और अपने कानूनी हक वाले पैसे का इस्तेमाल करने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। इसलिए बैंकों की यह जिम्मेदारी है कि वे यह पक्का करें कि फ्रीज करने की कोई भी कार्रवाई पूरी तरह से मिले निर्देशों के अनुसार हो और उन निर्देशों के दायरे से बाहर न जाए।

जस्टिस गोविंदराज ने कहा कि बैंक की यह आशंका कि भविष्य में और फ्रीज़िंग निर्देश मिल सकते हैं, मौजूदा निर्देशों में बताई गई रकम से ज़्यादा पैसे फ्रीज़ करने का कानूनी आधार नहीं बन सकती। उन्होंने बैंक को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के अकाउंट में सिर्फ़ 25,000 रुपये तक की रकम ही फ्रीज़ रखी जाए। हालांकि, अगर किसी सक्षम अधिकारी से ऐसी कार्रवाई करने का अनुरोध करने वाला कोई संदेश मिलता है, तो बैंक के पास याचिकाकर्ता के अकाउंट को और ज़्यादा फ्रीज़ करने की छूट होगी।