वॉशिंगटन: भारत ‘मिडिल पावर्स’ (मध्यम दर्जे की ताकतों) के एक नए मल्टीलेटरल (बहुपक्षीय) ग्रुप में शामिल हुआ है। यह ग्रुप पार्टनर्स फॉर मल्टीलेटरलिज्म (P4M) है। विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने सोमवार को न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली के दौरान पार्टनर्स फॉर मल्टीलेटरलिज्म (P4M) समिट की सह-अध्यक्षता की है। ऑस्ट्रेलिया, बारबाडोस, ब्राजील, कनाडा, यूरोपियन यूनियन और केन्या के साथ भारत P4M पहल के शुरुआती सह-प्रायोजकों में है। यह दिल्ली की ग्लोबल ऑर्डर में बदलाव की वकालत करते हुए अपने डिप्लोमैटिक विकल्पों को बढ़ाने की कोशिश है।
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट के मुताबिक, इससे दिल्ली को इस मंच की भविष्य की दिशा तय करने में सीधी भूमिका मिली है। समिट में जयशंकर ने कहा कि हम ऐसे समय में मिल रहे हैं जब ग्लोबल ऑर्डर दबाव में है। कुछ दशकों से दुनिया में लगातार रीबैलेंसिंग (संतुलन में बदलाव) देखी जा रही है, जो लंबे समय से अपेक्षित एक स्ट्रक्चरल बदलाव था। बहुत ज्यादा कॉम्पिटिशन, जियोपॉलिटिकल तनाव और संघर्षों ने इसे पूरी तरह से अलग रूप दे दिया है।
क्या है ग्रुप का उद्देश्य
P4M के संस्थापक सदस्यों का कहना है कि इस पहल का मकसद जियोपॉलिटिकल ध्रुवीकरण और मल्टीलेटरल सिस्टम पर बढ़ते दबाव के बीच ‘विभाजन के बावजूद गठबंधन बनाना’ है। इस ग्रुप ने UN में सुधार, सप्लाई चेन की मजबूती, व्यापार, फाइनेंस, नई टेक्नोलॉजी और क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों पर मिलकर काम करने का वादा किया है।
दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के पूर्व प्रोफेसर स्वर्ण सिंह का कहना है कि भारत इसका इस्तेमाल पश्चिमी या गैर-पश्चिमी गुटों में बंधे बिना, मुद्दों पर आधारित गठबंधन बनाने के लिए कर सकता है। P4M के संस्थापक घोषणापत्र में सदस्य देशों ने मौजूदा मल्टीलेटरल व्यवस्था को बदलने के बजाय उसमें सुधार करने का संकल्प लिया है।
भारत के लिए अहमियत
स्वर्ण सिंह ने कहा कि भारत जैसी मध्यम शक्ति वाले देशों के लिए, रणनीतिक स्वायत्तता अब प्रतिस्पर्धी गुटों के बीच किसी एक को चुनने के बजाय, कई ओवरलैपिंग नेटवर्क रखने पर निर्भर करती है। P4M का अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ा स्वरूप इसलिए अहम है क्योंकि इसने यूरोप, एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र के देशों को एक साथ जोड़ा, बिना उन्हें वाशिंगटन या बीजिंग के खिलाफ किसी गुट में शामिल किए।
सिंह के मुताबिक, ‘इससे भारत जैसे देशों के लिए कूटनीतिक गुंजाइश बनती है जो गुट-राजनीति से बचते हुए अपनी साझेदारियों में विविधता लाना चाहते हैं।इस फaरम की उपयोगिता उसके घोषणापत्रों के बजाय उसके कामों पर निर्भर करेगी। अपने संबोधन में जयशंकर ने क्लाइमेट एक्शन, उभरती हुई टेक्नोलॉजी, डेवलपमेंट फाइनेंस, आतंकवाद से मुकाबला और सप्लाई चेन की मजबूती पर जोर दिया है।’
नया गुट के गठन का समय
P4M का पहला शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब 15 देशों वाली UN सुरक्षा परिषद गहरे मतभेदों से जूझ रही है। UN के पांच स्थायी और वीटो का अधिकार रखने वाले सदस्यों- चीन, फ्रांस, रूस, यूके और अमेरिका के बीच तीखे मतभेदों के कारण अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखने की कोशिशें मुश्किल हो गई हैं।
न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी पॉलिसी इंस्टीट्यूट में साउथ एशिया इनिशिएटिव्स की डायरेक्टर फर्वा आमिर ने कहते हैं, ‘P4M उन सभी बातों के अनुरूप है जिनका भारत समर्थन करता रहा है, जिसमें मल्टीलेटरल सुधार भी शामिल हैं। इसलिए इसमें भारत की भागीदारी कोई हैरानी की बात नहीं है। भारत के पास दूसरे मंच भी हैं लेकिन यह मंच दिल्ली को ज्यादा अंतरराष्ट्रीय प्रभाव दिलाता है।
भारत बना रहा नेटवर्क
भारत की अशोका यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर उदय चंद्र ने कहा कि मिडल पावर्स बड़ी ताकतों की आपसी खींचतान में फंसती जा रही हैं लेकिन वे हर मुद्दे पर एक ही पक्ष चुनने की न तो इच्छा रखती हैं और ना ही उन्हें इसकी जरूरत है। वे ऐसे लचीले गठबंधन पसंद करते हैं, जो व्यापार, सप्लाई चेन, क्लाइमेट चेंज, AI गवर्नेंस या इंटरनेशनल संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दों पर जरूरत के हिसाब से नए सिरे से बन सकें।
विश्वसनीयता बड़ी चुनौती
स्वर्ण सिंह के मुताबिक, भारत की पार्टनरशिप हिंद महासागर को दक्षिण-पूर्व एशिया और व्यापक इंडो-पैसिफिक से जोड़ रही हैं। भारत को अपनी डिप्लोमैटिक एक्टिविज्म (राजनयिक सक्रियता) को संस्थागत और ठोस नतीजों में बदलना होगा। इसका मतलब पब्लिक गुड्स (सार्वजनिक भलाई की चीजों) का भरोसेमंद प्रोवाइडर बनना है।



