पूनम पाण्डे: स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन ( SIR ) से शुरू हुई बहस अब उस जगह पहुंच गई है, जहां मामला सिर्फ वोटर लिस्ट का नहीं बल्कि चुनावी संस्थाओं पर भरोसे का भी है। चुनाव आयोग पर सवाल उठना इसलिए गंभीर है क्योंकि सरकार बदलती है, नेता बदलते हैं, सत्ता पक्ष विपक्ष बनता है और विपक्ष सत्ता में आता है, लेकिन चुनाव आयोग इस पूरी राजनीति और लोकतंत्र का वह आधार है, जिसमें मामूली दरार भी घातक हो सकती है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद अब SIR ही नहीं, वोटर लिस्ट और पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी अंगुली उठाई जा रही है। कांग्रेस 25 सितंबर को देश के कई हिस्सों में सड़कों पर उतरी। मांग थी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई की। विपक्ष के कई दलों ने भी आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग की है।
जानकारी जनता का अधिकार
किसी संस्था में असहमति होना अपने आप में संस्था के कमजोर होने का प्रमाण नहीं। लेकिन, अगर तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था के दो सदस्य किसी भी मसले पर बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज करते हैं, तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि उन आपत्तियों पर क्या विचार हुआ? उन्हें स्वीकार किया गया या खारिज? भले ही आयोग कहे कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग का काम सिर्फ चुनाव कराना नहीं, प्रक्रिया पर भरोसा बनाए रखना भी है।
पारदर्शिता से बनेगी बात
SIR जैसे बड़ी एक्सरसाइज में पारदर्शिता इसलिए और जरूरी हो जाती है क्योंकि इसका सीधा संबंध नागरिकों के सबसे बुनियादी राजनीतिक अधिकार से है। इसीलिए चुनाव आयोग को अपने खिलाफ लगे गए हर आरोप का जवाब सिर्फ राजनीतिक बयान के रूप में नहीं, डेटा और दस्तावेजों के साथ देना चाहिए। जितनी ज्यादा जानकारी सार्वजनिक होगी, उतनी कम जगह संदेह के लिए बचेगी।
चुनाव आयोग को करना होगा शंका का समाधान
अगर वोटर्स के मन में शंका उठती है कि क्या उनका वोट सुरक्षित है, तो इसका समाधान चुनाव आयोग को करना ही होगा। चुनाव में जीत-हार दोनों ही पहलू हैं। जीतने वाले का चुनावी प्रक्रिया में जितना भरोसा होता है, उतना ही हारने वाले का भी होना चाहिए। SIR को वोटर के नजरिए से देखा जाए। एक भी वोटर का नाम अगर प्रक्रिया की गड़बड़ी से कटता है तो यह लोकतंत्र के लिए बिल्कुल सही नहीं है। वोटर को अपने इस लोकतांत्रिक अधिकार के लिए परेशान न होना पड़े, यह सुनिश्चित करना भी आयोग की जिम्मेदारी है।



