अभिषेक मिश्र: आज कश्मीर को लेकर भले अमेरिका कहता हो कि यह भारत का अंदरूनी मामला है, लेकिन करीब सात दशक पहले हालात जुदा थे। 1950 के दशक की शुरुआत में अमेरिका के लिए कश्मीर महज भारत और पाकिस्तान के बीच का विवाद नहीं था। शीत युद्ध के दौरान वह इसे मध्य और दक्षिण एशिया के लिए रणनीतिक तौर पर अहम मानता था। अमेरिकी दस्तावेजों और खुफिया रिपोर्ट से पता चलता है कि कैसे अमेरिका की कश्मीर में दिलचस्पी थी। यहां की भौगोलिक स्थिति और कई देशों से लगी सीमाओं के कारण उसकी नजर में यह इलाका महत्व रखता था।
रिपोर्ट में जिक्र। 1951 की अमेरिकी
खुफिया रिपोर्ट में कश्मीर को लेकर वहां के अधिकारियों के बीच हुई बातचीत का ब्यौरा मिलता है। इसमें फ्रैंक कॉलिन्स, हॉवर्ड मेयर्स और मिस्टर मैफेट का जिक्र है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कॉलिन्स और मैफेट का झुकाव पाकिस्तान व ब्रिटेन की तरफ था और वे भारत के आलोचक थे। हॉवर्ड मेयर्स को ज्यादा संतुलित अधिकारी बताया गया। जनवरी 1951 के एक गोपनीय अमेरिकी ज्ञापन में कश्मीर विवाद पर ब्रिटेन और अमेरिका की रणनीति पर
चर्चा हुई। अमेरिका चाहता था कि
ब्रिटेन पहल करे। दस्तावेज में भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर में नैशनल कॉन्फ्रेंस की गतिविधियों और प्रस्तावित संविधान सभा को लेकर भी चिंता जताई गई थी। अक्टूबर 1950 में नैशनल कॉन्फ्रेंस ने संविधान सभा बुलाने का प्रस्ताव पारित किया था, जिसका पाकिस्तान ने विरोध किया था।
उलझा रहा मामला । दस्तावेज में जनमत
संग्रह का भी जिक्र है। अधिकारी ने कहा कि अमेरिका और ब्रिटेन अगर पाकिस्तान पर सैनिकों, नागरिकों और कबायली लड़ाकों को वापस बुलाने का दबाव डालें और आजाद कश्मीर फोर्स को खत्म किया जाए, तो जनमत संग्रह संभव है। भारत का तर्क था कि पहले पाकिस्तान की सेना और घुसपैठियों की वापसी जरूरी है। इसी मतभेद से मामला उलझा रहा।
अव्यावहारिक बंटवारा । खुफिया दस्तावेज
में शेख अब्दुल्ला और तत्कालीन अमेरिकी राजदूत लॉय हेंडरसन की बातचीत का भी जिक्र है। अब्दुल्ला ने आजाद कश्मीर देखने की इच्छा जताई और कहा कि कई कश्मीरी भी ऐसा चाहते हैं। उनका मानना था कि स्वतंत्र कश्मीर के लिए भारत और पाकिस्तान दोनों से अच्छे रिश्ते जरूरी होंगे। अब्दुल्ला ने पाकिस्तान के धार्मिक शासन को कश्मीर के लिए नुकसानदेह बताया और भारत के साथ जाना बेहतर माना। उन्होंने कश्मीर के बंटवारे को भी अव्यावहारिक बताया।
अब्दुल्ला की गिरफ्तारी। तब शेख
अब्दुल्ला के सहयोगी रहे बख्शी गुलाम मोहम्मद भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहे थे। वह दिल्ली के संपर्क में रहते और घाटी की गतिविधियों की जानकारी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को देते थे। 1953 में अब्दुल्ला को पद से हटाकर गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर विदेशी ताकत से मिलीभगत के आरोप लगे।
हालांकि, तब नेहरू ने अमेरिकी साजिश की बात खारिज की थी। फरवरी 1954 में बख्शी के नेतृत्व वाली कश्मीर विधानसभा ने भारत में विलय के पक्ष में फैसला किया। नेहरू ने कहा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की राय सामने आ चुकी है, इसलिए जनमत संग्रह जरूरी नहीं है।



