नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन ( SIR ) के बाद मतदाता सूची से हटाए गए अनगिनत वोटर शायद एक दशक तक वोट न दे पाएं। ऐसा इसलिए हो सकता है कि क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित की गई अपीलीय ट्रिब्यूनलों को उनके नाम दोबारा शामिल करने की अपील पर फैसला लेने में 12 साल से ज्यादा का समय लग सकता है। यह अनुमान मौजूदा फैसलों की रफ्तार पर सामने आए हैं। ऐसे में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में ट्रिब्यूनलों की संख्या को बढ़ाने की मांग की है।
चुनाव आयोग द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे के मुताबिक, अप्रैल के बीच में काम शुरू होने के बाद से पिछले पांच महीनों में ट्रिब्यूनल ने 1,26,194 आवेदनों पर फैसला किया है। यानी शनिवार और रविवार समेत सभी दिन काम करने के बावजूद हर महीने औसतन करीब 25,238 मामलों का निपटारा हुआ है।
37 लाख से ज्यादा मामले लंबित
16 सितंबर को जब हलफनामा दायक किया गया था, तब ट्रिब्यूनलों के सामने 37,05,235 मामले लंबित थे। मौजूदा रफ्तार से, अगर ट्रिब्यूनल हफ्ते के सातों दिन काम करें, तो सभी मामलों पर फैसला लेने में 146 महीने लगेंगे।
चुनाव आयोग ने माना है कि 37 लाख मामलों के निपटारे का बहुत बड़ा काम करने के लिए मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रिब्यूनल की संख्या काफी नहीं है। आयोग ने कोर्ट से गुजारिश की कि राज्य में ट्रिब्यूनल की संख्या 24 से बढ़ाकर 42 (मौजूदा संख्या से लगभग दोगुनी) कर दी जाए और ज्यूडिशियल अधिकारियों को घर से काम करने की इजाजत दी जाए।
लोकसभा सीटों के बराबर ट्रिब्यूनल बनाने का प्रस्ताव
टीएमसी सांसद डेरेक ओ’ब्रायन की याचिका के जवाब में दाखिल हलफनामे में कहा गया, ‘लंबित अपीलों के निपटारे को और बेहतर और तेज बनाने के मकसद से, यह प्रस्ताव है कि पश्चिम बंगाल राज्य में अपीलेट ट्रिब्यूनल की संख्या बढ़ाने पर विचार किया जाए ताकि यह राज्य में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या के बराबर हो सके और लंबित अपीलों का तेजी से निपटारा हो सके।’ इसमें कहा गया कि ज्यूडिशियल अधिकारियों को घर से सुनवाई करने और अन्य कार्यवाही करने की इजाजत देने से ‘आने-जाने में लगने वाले समय को कम करके लंबित अपीलों के निपटारे में तेजी लाने में मदद मिलेगी।’
ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली SOP के तहत
ट्रिब्यूनल के कामकाज को लेकर दायर एक याचिका के जवाब में आयोग ने एक और हलफनामा दाखिल किया। इसमें कहा गया कि ट्रिब्यूनल का गठन सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर किया गया था। इनके कामकाज के लिए स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) उस कमेटी ने तैयार किया है जिसे इसी मकसद से बनाया गया था। इस कमेटी में कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज भी शामिल थे।
आयोग ने कहा कि ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली, प्रक्रिया और लोगों की पहुंच से जुड़े मुद्दे SOP और संबंधित अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इनसे जुड़ी व्यवहारिकता, तौर-तरीके और क्रियान्वयन पर फैसला संबंधित अपीलीय ट्रिब्यूनल और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किया जाना उचित होगा।



