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श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर में अब एक नई कॉन्ट्रोवर्सी खड़ी होती नजर आ रही है। जम्मू-कश्मीर पुलिस ने मस्जिदों, उनकी मैनेजमेंट कमेटियों और इमामों का विवरण इकट्ठा करने के लिए एक चार-पेज का फॉर्म जारी किया है। पुलिस के इस कदम को पीडीपी समेत कई संगठनों ने प्राइवेसी में सेंध और पक्षपात बताया है।

‘इस फैसले से लोगों में असुरक्षा’

इस मुद्दे पर जम्मू और कश्मीर के सबसे बड़े इस्लामी संगठनों के समूह मुत्ताहिदा मजलिस-ए-उलेमा (एमएमयू) ने उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार से इस कवायद को रोकने की अपील की है। उनका कहना है कि इससे लोगों में असुरक्षा की भावना पैदा हो गई है। जम्मू-कश्मीर पुलिस केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को रिपोर्ट करती है।

‘बीजेपी-आरएसएस की वैचारिक परियोजना’

मौलाना और नेशनल कॉन्फ्रेंस से श्रीनगर के सांसद रुहुल्लाह मेहदी ने इस निगरानी को एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि ‘बीजेपी-आरएसएस की वैचारिक परियोजना’ का हिस्सा करार दिया है। सांसद रुहुल्लाह मेहदी के अनुसार, यह एक ‘खतरनाक संदेश’ भेजता है। उन्होंने सवाल उठाया कि कश्मीर में पहले से ही कई सुरक्षा और निगरानी व्यवस्थाएं मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि सरकार के पास आधार और पैन कार्ड जैसे माध्यमों से लोगों का डेटा पहले से ही है। उन्होंने कहा कि यह अतिरिक्त डेटा क्यों इकट्ठा किया जा रहा है।

पीडीपी के नेता ने जताई चिंता

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के नेता वाहिद पारा ने भी इस पर चिंता जताई है। उन्होंने चेतावनी दी है कि किसी एक समुदाय को चुनिंदा तौर पर निशाना बनाने से अविश्वास बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि सरकार के इस कदम से मौलवियों को अलग-थलग कर दिया जाएगा। वाहिद पारा ने सुझाव दिया कि पुलिस को उनका प्रोफाइल बनाने के बजाय उनसे बातचीत के जरिए जुड़ना चाहिए।