नई दिल्ली: रेलवे अपनी एक दशक से भी ज्यादा पुरानी पीपीपी पॉलिसी में बड़े बदलाव की तैयारी में है। इसका मकसद निजी कंपनियों के लिए नीति को आकर्षक बनाना है। प्रस्तावित बदलावों के मुताबिक कन्सेशन पीरियड को बढ़ाकर 50 साल किया जाएगा और भूमि अधिग्रहण की पूरी जिम्मेदारी रेलवे की होगी। अधिकारियों का कहना है कि रिवाइज्ड पॉलिसी इसलिए अहम है क्योंकि रेलवे ने मार्च 2028 तक 35,800 करोड़ रुपये के 15 ऐसे प्रोजेक्ट्स की पहचान है जिन्हें पीपीपी के तहत विकसित किया जाना है। इनमें नई लाइन, मौजूदा लाइनों का दोहरीकरण और स्टेशनों का रिडेवलपमेंट शामिल है।
अभी अधिकांश मामलों में कन्सेशन पीरियड 20 से 35 साल के बीच है। रेलवे के एक अधिकारी ने कहा, ‘हमने कुछ प्रोजेक्ट पीपीपी के तहत फाइनल अप्रूवल के लिए भेजे हैं। इन दो अहम बदलावों से प्रोजेक्ट के सामने आ रही सारे जोखिमों का समाधान हो जाएगा।’ अभी रेलवे प्रोजेक्ट्स 2012 की पॉलिसीज के तहत बनाए जा रहे हैं।
अब तक की प्रोग्रेस
दिसंबर 2025 तक 16,686 करोड़ रुपये के केवल 18 प्रोजेक्ट ही इस रूट के जरिए पूरे हो पाए हैं। 16,362 करोड़ रुपये के सात प्रोजेक्ट अभी चल रहे हैं। इनमें कोल कनेक्टिविटी और पोर्ट कनेक्टिविटी के प्रोजेक्ट शामिल हैं। अधिकारियों का कहना है कि मौजूदा पॉलिसी के तहत भूमि अधिग्रहण की लागत निजी कंपनी या स्पेशल पर्पज वीकल वहन करती है और रेलवे केवल भूमि अधिग्रहण करती है।एक अधिकारी ने कहा, ‘प्रस्तावित बदलावों के तहत भूमि अधिग्रहण की लागत और जमीन लेने की प्रक्रिया को पूरा करने का काम पूरी तरह रेलवे के जिम्मे होगा।’ भूमि अधिग्रहण के कारण अक्सर प्रोजेक्ट अटक जाते हैं। हाइवेज में ऐसा देखने को मिला है और इस अनुभव को देखते हुए सरकार नीति में बदलाव करने जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि इसकी शुरुआत हो चुकी है। रेलवे मिनिस्टर अश्विनी वैष्णव ने हाल में गति शक्ति मल्टी-मोडल कार्गो टर्मिनल्स (GCTs) के लिए 50 साल के कन्सेशन पीरियड की घोषणा की थी।



