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नई दिल्ली: देश में सेना और रेलवे में अभी भी काफी परंपरा अंग्रेजों के जमाने की चली आ रही है। हालांकि इनमें धीरे-धीरे बदलाव हो रहा है। साथ ही जो नई परंपरा शुरू हुई है, उसमें भी बदलाव हो रहा है। इसी क्रम में रेल मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लिया है। फैसला यह है कि अब रिटायर होने वाले रेल कर्मचारियों और अधिकारियों को गोल्ड प्लेटेड चांदी का सिक्का नहीं दिया जाएगा।

सिक्के में भी हुआ भ्रष्टाचार?

रेलवे से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इस फैसले के पीछे चांदी की कीमत में भारी बढ़ातरी और भ्रष्टाचार का योगदान है। पिछले दिनों ही मध्य प्रदेश से ऐसी खबर आई थी कि रेलवे ने कार्मिक के रिटायर होने के दिन जो सिल्वर क्वाइन दिए थे, वे मिलावटी थे। जांच में पता चला कि उसमें चांदी की काफी कम मात्रा थी। सिक्के ज़्यादातर तांबे के बने थे। मतलब कि सिक्के खरीदने वालों ने गड़बड़ी की थी। इसलिए अब फैसला लिया गया कि रिटायर होने के दिन कोई सिक्का नहीं दिया जाएगा।

सभी जोन को भेजी गई चिट्ठी

रेलवे बोर्ड की तरफ से सभी ज़ोन और प्रोडक्शन यूनिट्स के प्रमुखों को एक चिट्ठी भेजी गई है। इसमें लिखा है, "…अब यह तय किया गया है कि रिटायर होने वाले रेल कर्मचारियों और अधिकारियों को गोल्ड प्लेटेड सिल्वर क्वाइन या मेडल देने की परंपरा खत्म कर दी जाए। जो चांदी के सिक्के रेलवे के पास पहले से खरीदे हुए या स्टॉक में हैं, उनका हिसाब-किताब रखा जाए और उन्हें दूसरी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जाए, ताकि उनके इस्तेमाल से जुड़ी चिंताएं दूर हो सकें। इस फैसले को राष्ट्रपति की मंजूरी है।"

वजह नहीं बताई गई

हालांकि, इस चिट्ठी में फैसला लेने की कोई खास वजह नहीं बताई है। लेकिन अधिकारियों का कहना है कि कई तरह की चिंताएं थीं। जैसे कि बाहर के वेंडरों से खरीदे गए सिक्कों की क्वालिटी खराब थी। साथ ही, चांदी महंगी होने की वजह से खर्च कम करने की भी ज़रूरत थी।

कब शुरू हुई यह परंपरा

रिटायर्ड लोगों को चांदी का सिक्का भेंट करने की परंपरा मार्च 2006 में शुरू हुई थी। तब मंत्रालय ने फैसला किया था कि जो भी रेलवे कर्मचारी या अधिकारी वॉलंटरी रिटायरमेंट लेते हैं या अपनी नौकरी पूरी करके रिटायर होते हैं, उन्हें करीब 20 ग्राम का सोने की परत चढ़ा हुआ चांदी का सिक्का दिया जाएगा। उस समय इस सिक्के की कीमत करीब एक हजार रुपये पड़ती थी। अब इसकी कीमत करीब 10 हजार रुपये पड़ रही है।