नई दिल्ली: महेश चूरी पालघर (महाराष्ट्र) के गांव बोर्डी के रहने वाले हैं। उन्होंने इस गांव में ही बिजनेस का जबरदस्त मॉडल खड़ा करके दिखाया है। वह ‘चीकू पार्लर’ के संस्थापक हैं। 80 के दशक में महेश चूरी अपना गांव छोड़कर मैकेनिकल इंजीनियर बनने चले गए थे। सालों बाद एक सवाल उन्हें वापस अपने गांव खींचकर लाया। सवाल था- ‘कैसे मैं चीकू में वैल्यू एडिशन करके गांव के किसानों की मदद कर सकता हूं।’ इस गांव में चीकू की बंपर पैदावार होती है। महेश ने 2009 से इस फल पर बहुत सारे प्रयोग किए। मिल्कशेक के लिए पाउडर से लेकर मिठाई बनाने तक इसमें बहुत कुछ शामिल था। कई सालों की असफलताओं के बाद 2017 में उनके वेंचर की नींव पड़ी। यह चीकू से पेड़ा, टॉफी, मिल्कशेक और आइसक्रीम जैसे 16 से ज्यादा प्रोडक्ट बनाते हैं। इन्हें बनाने में किसी तरह के प्रिजर्वेटिव का इस्तेमाल नहीं होता है। इस वेंचर से कई महिलाओं को रोजगार मिला हुआ है। ‘चीकू पार्लर’ ने महेश चूरी को करोड़पति बना दिया है। आइए, यहां उनकी सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।
नौकरी छोड़ गांव लौटने का किया फैसला
महेश चूरी महाराष्ट्र के गांव बोर्डी के रहने वाले हैं। इस गांव में चीकू की बहुत अच्छी पैदावार होती है। महेश ने 1988 में मुंबई के वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलॉजिकल इंस्टीट्यूट से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में डिग्री लेने के लिए बोर्डी छोड़ दिया था। फिर मुंबई में BPL ग्रुप के साथ सर्विस इंजीनियर के तौर पर काम किया। 1996 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़कर बोर्डी लौटने का फैसला किया।
2017 में रखी स्टार्टअप की नींव
महेश को पता था कि उनके इलाके के चीकू बहुत अच्छी क्वालिटी के थे। हालांकि, किसानों को उनकी मेहनत का सही दाम नहीं मिलता था। उपज बर्बाद हो जाती थी। इसी सोच के साथ महेश ने करीब 12 साल तक संघर्ष और सोच-विचार करते हुए समाधान खोजने का सफर शुरू किया। आखिरकार उन्होंने दिसंबर, 2017 में अपना स्टार्टअप ‘चीकू पार्लर’ शुरू किया। यह चीकू से जुड़ी सभी चीजों के लिए वन स्टॉप सॉल्यूशन है।
किसानों को हुआ फायदा
चीकू पार्लर अपने आउटलेट में चीकू से बनी मिठाइयां, टॉफी, मिल्कशेक और आइसक्रीम बेचता है। यह स्टार्टअप सीधे किसानों से लगभग 250 किलो चीकू लेता है। गांव की लगभग 20 महिलाएं इस वेंचर की बोर्डी यूनिट में काम करती हैं। पूरी मैन्युफैक्चरिंग का जिम्मा इन्हीं के कंधों पर होता है। सभी स्टार्टअप की तरह प्रोडक्ट बनाने के शुरुआती स्टेज में महेश के साथ भी कुछ अच्छा और कुछ बुरा हुआ। महेश ने सबसे पहले मिल्कशेक, मिठाई और डेजर्ट बनाने के लिए चीकू पाउडर बनाने का एक्सपेरिमेंट किया। फिर उन्होंने फल को छोटे पतले चिप्स में काटा। सोलर टेंट ड्रायर का इस्तेमाल करके उसे सुखाया। चिप्स को पाउडर बनाने के लिए उन्होंने इन-हाउस एक खास मशीन बनाई जो चिप्स को मोटा-मोटा पीसकर चिपचिपाहट को रोक सकती थी।
कई विफलताओं के बाद सफलता
पहले तो आइडिया काम नहीं किया। लेकिन, खुशकिस्मती से बाद में कई प्रयोगों के बाद इसी में सफलता हाथ लगी। पहला चीकू पार्लर बोर्डी सीसाइड पर बना था। अब ये पार्लर कई और जगहों पर खुल गए हैं। एक मुंबई अहमदाबाद हाईवे पर और दो मुंबई-नासिक हाईवे पर हैं। अभी, चीकू पार्लर में कई तरह की भारतीय मिठाइयां, आइसक्रीम और मिल्कशेक मिलता है। ‘मीठा चीकू’ कैटेगरी के तहत वह बर्फी, कतली, पेड़ा, हलवा जैसी मिठाइयां बेचते हैं। चीकू पाउडर और रवा ‘सूखा चीकू’ के तहत बेचा जाता है। जबकि ‘कूल चीकू’ के तहत मिल्कशेक और आइसक्रीम मिलती है।



