पटना: दलित राजनीति को लेकर वर्तमान गठबंधन की राजनीति में NDA को बढ़त तो मिल ही रही है। यही वजह भी है कि NDA के दलित आधार वाले साथी दल थोड़े खुले-खुले रह कर विचार भी प्रकट कर रहे थे और अपनी ताकत के इजहार के जरिए सीट शेयरिंग को मुद्दा भी बना रहे थे। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि साथी दल लोजपा(आर) अपनी ही सरकार की खिंचाई कर एक विद्रोह वाला चेहरा दिखा रहे थे। कभी-कभी तो दलित आधार वाले साथी दल एक दूसरे के विरुद्ध भी खड़े हो जा रहे थे। पर चुनाव के नजदीक आते आते लोजपा(आर) और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा सेक्युलर ने यू टर्न लिया और फिर कसीदे ही पढ़े जाने लगे। जानिए NDA के दलित आधार वाले साथी दलों के बदलाव की कहानी उन्हीं की जुबानी, वो भी NBT ऑनलाइन को मिली एक्सक्लूसिव जानकारी के जरिए।
लोजपा का उखड़ा उखड़ा चेहरा
चुनाव के प्रारंभ में केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने न केवल खुद के चुनाव लड़ने की घोषणा की बल्कि 243 सीटों पर लोजपा(आर)के लड़ने की बात कह कर चौंका दिया। फिर तो इसके बाद तो नालंदा, खगड़िया और शाहाबाद तक से आवाजें उठने लगी कि चिराग पासवान यहां से लड़े। तब राजनीतिक गलियारों में लोजपा(आर) की इस घोषणा को गंभीरता से लिया। इसके कारण भी थे, वह इसलिए कि केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान आरा के बाबू वीर कुंवर सिंह स्टेडियम, रमना मैदान से बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट के मूल मंत्र का संदेश दे चुके थे। इस नारे के पीछे चिराग पासवान के नेतृत्व की उत्कंठ इच्छा का भी बोध होता है। कह तो यह भी दिया कि यह महासभा बिहार के उज्ज्वल भविष्य की नींव रखने वाला एक जन आंदोलन है। फिर चुनाव लड़ने की बात सामने आई तो चिराग पासवान ने इनकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि मेरे चुनाव लड़ने का निर्णय संसदीय बोर्ड करेगी।



