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22 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान बेंच इसकी जांच के लिए तैयार हुई। कोर्ट ने केंद्र और सभी राज्यों को नोटिस जारी किया है। अगली सुनवाई 29 जुलाई को होगी।

बेंच की अध्यक्षता सीजेआई बीआर गवई कर रहे हैं। उनके साथ जस्टिस विक्रम नाथ, सूर्यकांत, पीएस नरसिंह और अतुल चंदुरकर शामिल हैं।

यह बहस राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की ओर से 13 मई को सुप्रीम कोर्ट से मांगी गई सलाह के बाद शुरू हुई, जिसमें उन्होंने 14 संवैधानिक सवाल उठाए।

इससे पहले 8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने आर्टिकल 142 का उपयोग करते हुए कहा था कि राष्ट्रपति को 3 माह के भीतर निर्णय देना चाहिए।

मामला सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल के फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए विधेयक पारित करने की समयसीमा तय की थी।

पहले जानिए यह मामला शुरू कहां से हुआ…

दरअसल, तमिलनाडु विधानसभा में 2020 से 2023 के बीच 12 विधेयक पारित किए गए। इन्हें मंजूरी के लिए राज्यपाल आरएन रवि के पास भेजा गया। उन्होंने विधेयकों पर कोई कार्रवाई नहीं की, दबाकर रख लिया।

अक्टूबर 2023 में तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई। इसके बाद राज्यपाल ने 10 विधेयक बिना साइन किए लौटा दिए और 2 विधेयकों को राष्ट्रपति के पास विचार के लिए भेज दिया। सरकार ने 10 विधेयक दोबारा पारित कर राज्यपाल के पास भेजे। राज्यपाल ने इस बार इन्हें राष्ट्रपति के पास भेज दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को एक अहम फैसले में राज्यपाल के इस तरह विधेयक अटकाने को अवैध बता दिया। जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने राज्यपाल से कहा- ‘आप संविधान से चलें, पार्टियों की मर्जी से नहीं।’

राज्यपाल ने ‘ईमानदारी’ से काम नहीं किया। इसलिए कोर्ट ने आदेश दिया कि इन 10 विधेयकों को पारित माना जाए। यह पहली बार था जब राज्यपाल की मंजूरी के बिना विधेयक पारित हो गए।

संविधान में निर्धारित नहीं विधेयक की मंजूरी-नामंजूरी का समय

संविधान में यह निर्धारित नहीं किया गया है कि विधानसभा से पारित विधेयक को राज्यपाल या राष्ट्रपति को कितने दिनों के भीतर मंजूरी या नामंजूरी देनी होगी। संविधान में सिर्फ इतना लिखा है कि उन्हें ‘जितनी जल्दी हो सके’ फैसला लेना होगा।