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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राष्ट्रपति और राज्यपाल की मंजूरी की डेडलाइन तय करने वाली याचिकाओं पर अंतिम दिन सुनवाई की और फैसला सुरक्षित रख लिया है। इस दौरान चीफ जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि अगर लोकतंत्र का कोई अंग अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करता, तो अदालत चुपचाप बैठी नहीं रह सकती। उन्होंने पूछा,

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किसी भी ऊंचे पद पर कोई हो, वह कानून से ऊपर नहीं है। अगर गवर्नर बिलों पर महीनों तक बैठे रहेंगे, तो क्या अदालत मजबूर होकर हाथ रखे बैठी रहे?

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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि अदालत गवर्नरों को किसी खास तरीके से निर्णय लेने का आदेश नहीं दे सकती। इस पर जस्टिस सूर्यकांत ने कहा- हम यह नहीं कह सकते कि गवर्नर किस तरह फैसला लें, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि वे फैसला करें।

सॉलिसिटर जनरल बोले- राष्ट्रपति-राज्यपाल पर डेडलाइन लागू करना गलत

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि कोर्ट को यह साफ करना चाहिए कि 8 अप्रैल को 2 जजों की बेंच का राष्ट्रपति और राज्यपाल की मंजूरी की डेडलाइन तय करने का फैसला सही नहीं है। उन्होंने कहा,

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अगर उस फैसले को ही सही माना गया तो भविष्य में बड़ी संख्या में याचिकाएं अदालत में दाखिल होंगी और न्यायपालिका पर बोझ बढ़ेगा।

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वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और अरविंद दातार ने केंद्र के इस तर्क का विरोध किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने इस बारे में कोई सवाल नहीं पूछा, इसलिए सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्दे पर विचार नहीं करना चाहिए।

CJI की अगुआई में 5 जजों की बेंच ने सुनवाई की

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की जगह इस मामले में चीफ जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली संविधान पीठ ने सुनवाई की। पीठ में जस्टिस सूर्यकांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और एएस चंद्रचूड़कर शामिल थे। सुनवाई 19 अगस्त से शुरू हुई थी।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा। वहीं, विपक्ष शासित राज्य तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, पंजाब और हिमाचल प्रदेश ने केंद्र का विरोध किया।