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काठमांडू: नेपाल ने कभी बड़ी उम्मीद से घरेलू एयरलाइंस के बेड़े को मजबूत करने के लिए चीन में बने विमानों पर भरोसा किया था, लेकिन अब यह इसके लिए सिरदर्द साबित हो गए हैं। पांच सालों से काठमांडू हवाई अड्डे पर चीन में बने विमानों का एक झुंड बेकार पड़ा है। यह अब एक बोझ बन गया है। इन विमानों की मौजूदगी अब एक ऐसी मुश्किल बन गई है, जिसे देश की सरकारी कंपनी नेपाल एयरलाइंस बार-बार कोशिशों के बावजूद हल नहीं कर पाई है। नेपाल की सत्ता संभालने वाले बालेन शाह को भी अब इन विमानों की चुनौतियों से जूझना होगा।

नेपाल एयरलाइंस के लिए ये चीनी विमान भारी बोझ बन गए हैं। एयरलाइंस इन्हें बेच नहीं सकती, न लीज पर दे पा रही है। न चीन वापस भेज सकती है। ये कोई कमाई नहीं करते, सिर्फ नुकसान करते हैं। पहले से ही आर्थिक संकट से जूझ रही नेपाल एयरलाइंस के लिए हालत को और खराब कर रहे हैं।

नेपाल एयरलाइंस पहले से ही 50 अरब रुपये से ज्यादा के कर्ज के बोझ तले दबी है। ऐसे में सफेद हाथी बन चुके चीनी विमानों ने संकट को और भी गहरा कर दिया है। नेपाल सरकार ने कर्ज पर इन विमानों को खरीदा था, जिस पर ब्याज लगातार बढ़ता जा रहा है। केवल पिछले साल में ही चीन में बने विमानों से जुड़े ब्याज ने बकाया देनदारियों में 68 करोड़ रुपये से ज्यादा की बढ़ोतरी कर दी है।

एयरलाइंस का विमानों पर भारी खर्च

लेकिन यह नुकसान यहीं नहीं खत्म होता है। भले ही यह विमान जमीन पर खड़े हैं और एक पैसे की कमाई नहीं करते। बावजूद इसके इनके रखरखाव पर भारी खर्च करना पड़ता है। काठमांडू टाइम्स की रिपोर्ट से पता चलता है कि बीमा, पार्किंग, इंजन का रखरखाव और मैनुअल में बदलाव पर मिलाकर एयरलाइन को हर साल लगभग 20 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

लीज पर भी नहीं लेने को तैयार कोई

नेपाल एयरलाइंस इन विमानों से पीछा छुड़ाना चाह रही है, लेकिन कोई इसे लीज पर भी लेने को तैयार नहीं है। एयरलाइन के एक अधिकारी ने काठमांडू टाइम्स को नाम न छापने की शर्त पर ये जानकारी दी है। सितम्बर 2022 में नेपाल एयरलाइंस ने लीज पर देने के लिए सार्वजनिक नोटिस जारी किया लेकिन एक भी बोली लगाने वाला सामने नहीं आया। विमानों को बेचने की भी कोशिश की गई, लेकिन उसका भी वहीं अंजाम हुआ।

एक दशक पुरानी कहानी

नेपाल एयरलाइंस को अपना पहला MA-60 विमान 27 अप्रैल 2014 को मिला। उसी साल 14 नवम्बर को एक Y-12E मिला। चीन ने ये दोनों विमान अनुदान के रूप में दिए थे। एक तरह से ये फंसाने की चाल थी। इसके बाद के वर्षों में एयरलाइन ने अतिरिक्त विमान खरीदकर अपने बेड़े का विस्तार किया। चीन से मिले ग्रांट और लोन से इसे फाइनेंस किया गया, जिसकी रकम 40.8 करोड़ युआन थी। यह उस समय 6.66 अरब नेपाली रुपये थी।

कुल रकम में 18 करोड़ युआन ग्रांट के रूप में मिले, जबकि 22.8 करोड़ युआन सॉफ्ट लोन के तौर पर दिए गए। लोन चुकाए जाने तक नेपाल के वित्त मंत्रालय के पास इसका मालिकाना हक है। वह चीन को 1.5 प्रतिशत सालाना दर पर भुगतान करता है। बदले में नेपाल एयरलाइंस से 1.75 प्रतिशत ब्याज लेता है। शुरुआत में ग्रेस पीरियड तक बोझ कम रहा, लेकिन यह मार्च 2021 में खत्म हो गया। लेकिन इसके पहले ही विमान सेवा से हटाए जा चुके थे।

विमान के साथ चनुौतियां

  • शुरुआत में ही ऑपरेशनल चुनौतियां सामने आ गईं। नेपाल एयरलाइंस के पास चीनी विमानों को उड़ाने के लिए योग्य और प्रशिक्षित पायलटों की कमी थी।
  • स्पेयर पार्ट्स की भी मुश्किल थी। वे आसानी से उपलब्ध नहीं थे और जब मिलते तो कीमत बहुत ज्यादा होती।
  • नेपाल के मुश्किल भौगोलिक इलाकों में विमानों की मांग काफी नहीं साबित हुए।
  • एयरलाइन के निदेशक मंडल ने 29 जून 2020 को विमानों के पूरे बेड़े को ग्राउंडेड करने (सेवा से हटाने) का फैसला किया।
  • तब से ये विमान खड़े हैं और धीरे-धीरे खराब होते जा रहे हैं।